शहर की मस्जिद काजी साहब की अलग पहचान है। इसकी तामीर ढाई सौ साल पहले जान
अली खां ने कराई थी। समय के साथ इसमें बदलाव होते रहे। टाउनहाल मोड़ पर
मोहल्ला रकाबगंज की इस ऐतिहासिक मस्जिद में मुकद्दस रमजान में रौनक बिखर
जाती है। यहीं से चांद की तस्दीक का ऐलान किया जाता है। जान अली खां ने
बड़े भूखंड पर मस्जिद की तामीर कराई
थी। बंगश नवाब के खासमखास रहे जान अली
के नाम पर भीकमपुरा में एक गढ़ी भी आबाद है। इस मस्जिद की इमामत स्व. शहर
काजी सैयद ताहिर अली करते रहे। इससे मस्जिद काजी साहब के नाम से प्रसिद्ध
हो गई। अब उनके बेटे शहर काजी मुताहिर अली इमामत की जिम्मेदारी संभाले हैं।
हालांकि वक्फ बोर्ड में जान अली खां का नाम दर्ज है। तीन गुंबदों वाली इस
मस्जिद के मुख्य द्वार को नया रूप कुछ साल पहले ही दिया गया है। अंदरूनी
हिस्सा भी काफी सुसज्जित है। सामने अरबी भाषा में सीमेंट की कारीगरी से
कलमा लिखा गया है। नमाजियों की सुविधा के लिए मुख्य गेट के पास हैंडपंप लगा
है और पूर्व विदेश मंत्री की तरफ से दिया गया वाटर कूलर अंदर रखा है।
आसपास के दुकानदार प्यास बुझाने के लिए मस्जिद में आते हैं।
मस्जिद की
आमदनी का मुख्य स्रोत वक्फ संपत्ति पर बनी दुकानें हैं। वैसे तो यहां पांच
वक्त की नमाज के साथ सीरत कमेटी के जुलूसे मोहम्मदी, हाजियों के स्वागत आदि
के कार्यक्रम होते रहते हैं। हिलाल कमेटी चांद की तस्दीक इसी मस्जिद से
करती है। रमजान माह में मस्जिद में सहरी व इफ्तार के वक्त रौनक बिखर जाती
है।