कंपिल इलाके का गांव है सिकंदरपुर खास। यहां आबादी से ज्यादा बंदर हैं।
बंदरों के हमलों से गांव में दहशत है। यह फसल को नुकसान पहुंचाने के साथ ही
घरों से भी सामान उठा कर तहस नहस कर दे ले जाते हैं। इनके हमलों से रोज
कोई न कोई घायल हो जाता है। गांव के लोग अब फसल बोने से तौबा करने के मूड
में हैं। इन्हें कपड़े कमरों में सुखाने पड़ते हैं।
गांव के लोगों को डीएम
एनकेएस चौहान से इनसे बचाने की गुहार लगानी पड़ी है। सेवा हमेशा संस्था ने
सर्वे कर बंदरों के आतंक से लोगों के घायल होने व फसलों की नुकसानी का
आंकड़ा जुटाया है। यह चौंकाने वाला है।
गांव की आबादी 2000 के करीब है।
परिवार हैं 250 के लगभग। बंदरों की तादाद है तकरीबन 3000। इनसे गांव के लोग
पार नहीं पा रहे। गांव के दिनेश चंद्र की 4 बीघा फसल को बंदरों ने तहस नहस
कर दिया। महेंद्र सिंह की तीन बीघा गेहूं व 3 बीघा तंबाकू की फसल में करीब
50 हजार रुपये का नुकसान पहुंचाया। बंदरों से डरे रामबाबू ने एक बीघा खेत
में बुवाई ही बंद कर दी है। वह कहते हैं कि बंदरों ने डेढ़ लाख रुपये की
चोट दी है। 20 बीघा गेहूं, 10 बीघा तंबाकू व 5 बीघा बाग
में आम की फसल में
नुकसान कर दिया। गांव के किसान शंभूलाल बाथम, किशनलाल राजपूत, शरफुद्दीन,
नवीन चंद्र राजपूत, बाबूराम, महावीर, रामविलास का भी यही दर्द है। इनके
अलावा भी किसान बताते हैं कि बंदरों की वजह से खेती करना मुश्किल हो चला
है।
रोज होता कोई न कोई घायल
बंदरों के हमले से गांव में रोज ही
कोई न कोई घायल होता है। गांव में श्याम सिंह की मां पर बंदरों ने हमला
बोल दिया। हाथ में चोट लगी। गफ्फार अली व कृष्णगोपाल के परिवार के बच्चों
को बंदर स्कूल जाते समय घायल कर चुके हैं। रामशंकर की मां को बंदर ने काट
लिया। इनके इलाज में 10 हजार रुपये खर्च हुए। किशनपाल बाथम की मां का हाथ
बंदर
के हमले में टूट चुका है। गांव के ही किशन की मां भी इनकी दहशत छत से
नीचे गिर गईं। इसमें इनके पैर टूट गए। इलाज में परिवार की गांठ से 30 हजार
रुपये चले गए। गांव के राज सिंह, राजेंद्र राजपूत, विमलेश, सतीश, राकेश
बाथम, फुलवारी, खुशीराम यादव, अवनीश, सुभाष चंद्र राजपूत, हितेश मिश्रा,
विजय कांत शुक्ला, श्यामलाल राठौर, मदनलाल सहित कई परिवारों में लोग बंदरों
के हमले से लहूलुहान हो चुके हैं।
गृहस्थियों का सामान देते तोड़
गांव
के लाला प्रजापति मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते हैं। इनका कहना है कि
बंदर सामान तोड़ देते हैं। आशा राम श्रीवास्तव कहते हैं कि बंदर छप्पर व
टीन शेड तोड़ डालते हैं। हर साल नया छप्पर बनाना पड़ता है। सुधीर
श्रीवास्तव कहते
हैं कि बंदर कपड़े, सामान, जूता, चप्पल व खाने का सामान
उठा ले जाते हैं। बिजली के तार तोड़ देते हैं। कमरों में कपड़े सुखाने
पड़ते हैं। सावित्री देवी, शाकुद्दीन, शिवलाल राठौर, व गेंदा लाल कहते हैं
कि बंदरों के पोल झकझोरने से बिजली का तार टूट गया। करंट की चपेट में आने
से भैंस मर गई।
... तो गांव छोड़ जाएंगे लोग
सेवा हमेशा संस्था
के नूतन चतुर्वेदी का कहना है कि बंदरों के आतंक से छुटकारा न मिला तो
लोगों के लिए गांव छोड़ना मजबूरी होगी। घरों से लेकर खेतों तक बंदरों के
हमले होते हैं। महिलाएं व बच्चे इनके सबसे ज्यादा शिकार हैं।
अधिकारियों को लिखा जाएगा
डीएफओ डीके श्रीवास्तव का कहना है कि बड़े अधिकारियों को लिखा जाएगा। बंदरों को पकड़वाने की कार्रवाई कराई जाएगी।