मौसम के कहर से किसान परिवारों में दो वक्त की रोटी के भी लाले हैं। जेबें
खाली हैं और सिर चढ़ा है कर्ज। सामने बेटियों को ब्याहने की बड़ी
जिम्मेदारी। बची फसल से भी ज्यादा उम्मीद नहीं है। इस बेबसी में इनकी आंखों
से आंसू बहने लगते। चेहरा सपाट हो जाता। दर्द से होंठ भींच लेते।
एक
बार की मुसीबत होती तो इनसे बर्दाश्त भी हो जाती। पिछले साल आंधी ने
गेहूं उड़ा दिया। जैसे-तैसे जिंदगी पटरी पर आ रही थी कि बाढ़ और सूखा ने
तबाह कर दिया। अब बेमौसम बारिश ने इनकी जिंदगी को दर्द की भट्ठी में झोंक
दिया है। इलाकाई किसानों के हालात ठीक नहीं हैं। इन्हें राहत की कहीं से भी
कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है। शनिवार को
अमर उजाला टीम अमृतपुर
इलाके के मोहकमपुर गांव में है। दोपहर में गांव में सन्नाटा है। गांव के
मौरपाल कुशवाहा से बात करने पर इनका दर्द आंखों में उतर आता है। पिछले साल
इनका सात बीघे गेहूं आंधी में उड़ गया था। इसके बाद बाढ़ से 10 बीघे धान
में तगड़ा नुकसान हुआ। मंदी से पांच बीघे आलू की बिक्री में लागत भी सीधी
नहीं हुई और अब बरसात से
पांच बीघे गेहूं की फसल पसर गई। मौरपाल
बताते हैं कि खाने के लिए साधन सहकारी समिति से डेढ़ गुना वापसी पर पांच
क्विंटल गेहूं लेना पड़ा। 50 हजार रुपया कर्ज हो गया। 25 अप्रैल को बेटी
आरती की शादी है। इसके लिए नया कर्ज लेना पड़ेगा। यह सब कहते-कहते वह फफक
पड़ते हैं।
ऐसा ही दर्द गांव के रामचंद्र का है। इनके पास चार बीघा
खेत है। इनकी पीड़ा भी वही-आंधी, बाढ़, सूखा और बरसात.. ! इन्हें भी फसलें
नुकसान में फंसा गई हैं। 14 जून को बेटी सुनीता की शादी है। कोई राह नहीं
सूझ रही। दो वक्त की रोटी के लिए इन्हें भी संघ से 2 क्विंटल गेहूं लेना
पड़ा। गांव के लोगों से तीन क्विंटल गेहूं उधारी में लिया है। परिवार में
चार बेटे व
एक बेटी है। गेहूं की वापसी का भी संकट है। बेटी के
तिलक के लिए 10 हजार रुपया उधार लेना पड़ा। यह कहते हैं कि शादी भी कर्ज
से हो पाएगी। इसी गांव के किसान हैं रामदीन। इनके बेटे बेचेलाल का इस
सप्ताह एक्सीडेंट हो गया था। उसके इलाज के लिए 20 हजार कर्ज लिया है।
इन्होंने बटाई पर गेहूं बोया था। बरसात व तेज हवाओं से इनके खेत में भी
गेहूं
पसर गया। इनका कहना है कि 50 फीसदी पैदावार में गिरावट आएगी। कुछ ऐसी ही
दास्तानें गांव के बाकी किसानों की हैं। इनका कहना है कि सूखा राहत में एक
धेला भी नहीं मिला। बरसात से नुकसानी के सर्वे कों लेकर कहते हैं कि गांव
में लेखपाल सर्वे करने आए ही नहीं। बाद में यह कहने लगते, मेहनत पर भरोसा
है। हालात भी एक दिन बदल ही लेंगे।