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कोरोना के कहर से तरबूज की मिठास पर संकट

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गंगा की रेती में तैयार तरबूज की फसल। - फोटो : FARRUKHABAD
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फर्रुखाबाद। गर्मी के शुरुआती दिनों में तरबूज की रसीली मिठास लोगों का गला तर कर देती है। इस बार कोरोना तरबूज की मिठास पर भी कहर बनकर टूटा है। काला बादशाह के साथ ही माधुरी भी तैयार है, जी हां, इन दोनों वैरायटी की तरबूज की सैकड़ों बीघा फसल तैयार है। लेकिन लॉकडाउन के चलते तरबूज उत्पादक किसान इस समय चिंता में डूबे हैं।
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उनके सामने समस्या है कि स्थानीय तरबूज को दिल्ली की आजादनगर मंडी तक कैसे पहुंचाया जाए। यदि दिल्ली की मंडी तक माल पहुंच भी गया तो खरीदार मिलेंगे या नहीं, इस पर भी संशय है। जनपद में गंगा की रेती सहित अन्य स्थानों पर 3200 हेक्टेयर में तरबूज की खेती हुई है। अधिकतर तरबूज किसान आर्थिक दृष्टि से सामान्य श्रेणी के हैं।
कई लोगों ने ब्याज पर रुपये लेकर तरबूज की खेती की तो कई ने बैंक से ऋण लिया। लॉकडाउन के चलते कुछ दिनों से कई किसानों ने फसल में पानी लगाना कम कर दिया था। इससे तरबूज जल्दी न पके। इसके बावजूद कई खेतों में 3 से 6 किलो के तरबूज हो गए और पकने भी लगे।
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अब इनके दिल्ली की आजादनगर मंडी पहुंचने की चिंता किसानों को है और ये भी कि मंडी में पहुंचने के बाद खरीदार भी मिलेंगे या नहीं। शृंगीरामपुर स्थित टिश्यू कल्चर लैब के संचालक राहुल कुमार पाल का कहना है कि लैब से ही एक लाख पौध तरबूज उत्पादकों को दी है। गंगा की रेती का तरबूज पहले ही तैयार हो जाता है।
इसलिए संबंधित किसान परेशान हैं। बादशाह वैरायटी का काले रंग में लंबे साइज का तरबूज अधिकतम एक सप्ताह व हरा (माधुरी) अधिकतम 4 दिन तक ही रुक पाता है। इसके बाद खराब होने लगता है। भटपुरा के आजादनगर के किसान इस्लामुद्दीन कहते हैं कि काला तरबूज 2 किलो से ज्यादा वजन का होते ही पक जाता है।
कई खेतों में 4 से 5 किलो का तरबूज हो गया है। ट्रांसपोर्टर भी दिल्ली ट्रक भेजने को तैयार नहीं हो रहे हैं। यदि किसी तरह लेकर वहां पहुंच गए और वहां बिक्री नहीं हुई तो दिक्कत बढ़ जाएगी।
क्या कहते हैं जिम्मेदार
एडीएम विवेेक श्रीवास्तव ने बताया कि खाद्य सामग्री के वाहनों पर कोई रोक नहीं है। तरबूज ले जाने के लिए किसानों को खुद ही वाहन की व्यवस्था करनी है। एक वाहन पर चालक के अलावा दो लोग से अधिक नहीं जाएंगे। वाहन कहीं भी रोका नहीं जाएगा। तरबूज ले जाने के लिए अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है।
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