नागा संन्यासी परतंत्र भारत के ब्रिटिश शासकाें से आज भी दुश्मनी निभा रहे
हैं। नागा परंपरा के मंदिराें में ब्रिटिश शासकाें के चित्र वाले सिक्के
फर्श में चिनवाए गए हैं। ऐसा इनके अपमान के लिए किया गया है। नागा अखाड़े
आजादी के दौरान क्रांतिकारियाें की गतिविधियों के केंद्र भी रहे हैं।
नागा
परंपरा के पीलीभीत के गौरीशंकर मंदिर व गोला गोकर्णनाथ मंदिर में परतंत्र
देश के ब्रिटिश हुक्मरानाें के सिक्के फर्श में चिनवाए गए थेे। इनके अलावा
भी प्राचीन मंदिरों में ब्रिटिश हुक्मरानाें के चित्र वाले सिक्के फर्श में
लगवाए गए हैं। पंचदशनाम जूना अखाड़े के महंत योगेश्वरानंद गिरी का कहना
है कि ब्रिटिश हुकूमत ने धर्म को भी नुकसान पहुंचाया। यहां के लोगाें पर
जुल्म किए गए। महिलाआें और बच्चाें का कत्ल हुआ। खेत खलिहानाें और
बस्तियाें को आग के हवाले किया गया। नागा संन्यासी आज भी इनसे दुश्मनी निभा
रहे हैं। इनके चित्राें के ऊपर से गुजरकर अपमान किया जाता है।
ब्रिटिश
साम्राज्य के खिलाफ 1762 में पहला विद्रोह संन्यासियाें ने किया था।
ब्रिटिश इतिहासकार थॉमस लॉ ने भी इसका जिक्र किया है। 1770 में बंगाल में
अकाल के बाद संन्यासियाें ने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलन तेज कर दिया
था। इन्हाेंने ब्रिटिश फै क्ट्रियाें, कार्यालयाें पर हमले किए। अंग्रेज
कंपनियों ने इन्हें पकड़ने के लिए सेनाएं भेजीं लेकिन यह पकड़ में नहीं आए।
सन् 1873 में अंग्रेज हुक्मरानाें के माथे पर तिलक न लगाने के बयान से भी
संन्यासी भड़के थे।
कारतूसाें पर मांस की खबरें फैलाईं
महंत
योगेश्वरानंद का कहना है कि 1857 की क्रांति में नागा संन्यासियाें ने
कारतूसाें में गाय और सुअर की चर्बी लगी होने की खबराें को देश के हर
हिस्से में पहुंचाया। इनके अनुयायी जगह-जगह थे। इससे इनका नेटवर्क पूरे देश
में था। अनुयायियाें ने इनकी बात को माना भी। इससे भारतीयाें ने
अंग्रेजाें की ओर से लड़ने से मना कर दिया था।
दान से क्रांतिकारियाें की मदद
सत्यगिरी
का कहना है कि नागा संन्यासियाें ने दान के पैसाें से क्रांतिकारियाें की
मदद की। इससे आजादी की लड़ाई के लिए हथियार खरीदे गए। नागाआें क ो अस्त्र
शस्त्र रखने से मनाही नहीं थी। इनके जत्थों ने कई बार अंग्रेजाें पर हमले
कर इनके छक्के छुड़ाए।