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Farrukhabad News: उछलते-कूदते आरती करते हनुमान और अंगद

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कमालगंज। रामलीला में कानपुर-फतेहगढ़ मार्ग स्थित चौराहे पर रात्रिकालीन आरती की परंपरा 180 साल पुरानी है। 50 फीट लंबे और 30 फीट चौड़े घेरे में भगवान के सिंहासन के सामने हनुमान व अंगद आरती करते हैं। परंपरागत पात्र लिए हनुमान उछलते हुए घेरे में घूमते हैं और पीछे से अंगद चंवर लहराते हुए उछल-उछलकर चलते हैं। घेरे के बाहर जमा श्रद्धालुओं के जयकारे आरती को अद्भुत व अलौकिक बना देते हैं।
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जिस दिन मैदान में सीताहरण व हनुमान मिलन की लीला होती है, उसी दिन से चौराहे पर आरती का कार्यक्रम शुरू होता है। रामलीला मैदान में दिन की लीला मंचन के बाद श्रीराम का सिंहासन रेलवे तिराहे के पास अग्रवाल सेवा सदन के निकट विराम लेता है। सदन में प्रभु सेवा व भक्तजनों द्वारा आरती की जाती है। यहां से आठ बजे के बाद सिंहासन रवाना होता है।
रात नौ बजे के करीब सिंहासन के चौराहा पहुंचने पर आरती का यह अनोखा कार्यक्रम होता है। ''बोलौ सीताराम सीताराम राघवराम'' बोल से आरती का गायन शुरू होता है। पहले विशाल पात्र में कपूर प्रज्ज्वलित कर आचार्य फतेहगढ़ की ओर मुख मुद्रा में सिंहासन पर बैठे प्रभु रूपी स्वरूपों की आरती करते हैं। इसके बाद आरती के पात्र को हनुमानजी के हाथ में पकड़ा दिया जाता है।
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हनुमान व अंगद सड़क पर उछलते हुए घेरे का चक्कर लगाने लगते हैं। चक्कर लगाने के दौरान सिंहासन के आगे प्रभु स्वरूपों की आरती करते रहते हैं। इस दौरान गोल घेरे के बाहर सड़क व पटरी पर खड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ हनुमान-अंगद सहित प्रभु के जयकारों से माहौल को गुंजायमान करती है। पात्र में लगातार कपूर डाला जाता रहता है। पुराने समय में दो घंटे तक आरती का इतिहास रहा है।

ढोलक, मंजीरों की संगीत धुन में गायन टोली का उत्साह अनोखा
87 वर्षीय रामलीला के सेवक व पदाधिकारी मेवाराम गुप्ता बताते हैं कि ढोलक, चंग और मंजीरों की धुन पर आरती गायन टोली का उत्साह अनोखा बन जाता है। पुराने समय में हलवाई समाज से स्व. ग्याप्रसाद, रामगुलाम, फुल्लू, परशराम, श्याममनोहर, जगदीश, होतीलाल, पूरन, चंदर हलवाई का भी आरती गायन में नाम रहा। जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता, महादेव प्रसाद विश्नोई, नंदू बाजपेई, होतीलाल सुनार, मूलचंद्र गुप्ता, बुलाकी दास गुप्ता, अंगने महतिया, लाला फ़कीरेलाल, लालमन गुप्ता, पसोल दिवाकर, रघुनंदन लाल, लल्लू पंडित, जटाशंकर दुबे, किशोरी गुप्ता, सुरेश चौरसिया आदि ने आरती गायन को अमर किया। नेत्र ज्योति से वंचित जगदीश सूरदास जब चंग बजाते थे तो मानो उनकी आंखों में चमक बढ़ जाती हो। चंद्रशेखर मलैया वाले, नन्हें नट ढोलक वाले, अमीर हुसैन भी संगीत की फुहार बरसाते थे। (संवाद)
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