फर्रुखाबाद। विदेशों में फर्रुखाबादी लहंगा-दुपट्टे पर अपनी हुनरमंदी का डंका बजवाने वाले कारखानेदार और कारीगर जरदोजी पर छाई मंदी के चलते सब्जी बेचने और मजदूरी करने को मजबूर हैं। कारखानेदारों ने जहां चाय का होटल और कंफेक्शनरी आदि की दुकानें खोल ली हैं।
वहीं, कारीगर सब्जी बेचने और मजदूरी करने को मजबूर हैं। सूरत में तैयार हो रहे मशीनी लहंगा-दुपट्टा ने कारीगरों के हाथों से सुई छीनकर सब्जी का ठेला और ईंट-गारा का तसला थमा दिया है।
फर्रुखाबाद में करीब छह दशक पहले जरी-जरदोजी का कारोबार निम्न स्तर से शुरू हुआ था। फर्रुखाबाद से तैयार किए हुए लहंगे, साड़ी, सलवार, सूट, दुपट्टा आदि कपड़ों की डिमांड धीरे-धीरे अहमदाबाद, हैदराबाद, पंजाब, दिल्ली, मुंबई और कोलकाता आदि की मंडियों में होने लगी तो कारोबार ने रफ्तार पकड़ लिया।
इसके बाद फर्रुखाबादी जरदोजी की कद्र दुबई, पाकिस्तान और अमेरिका आदि में भी होने लगी। विदेशों में जरदोजी के कद्रदान बढ़ने से चार-पांच साल पहले फर्रुखाबाद का जरदोजी कारोबार करोड़ों रुपये पहुंच गया। बढ़ते जरदोजी काम के चलते शहर से लेकर गांव तक कई कारखाने लोगों ने डाल दिए।
सूरत में बनने वाले मशीन के लहंगों के चलते अब कारखानेदार और कारीगर मुफलिसी की जिंदगी बसर करने को मजबूर हैं। परिवार पालने के लिए कोई कारीगर सब्जी बेच रहा है तो कोई मजदूरी कर रहा। वहीं, कारखानेदार चाय का होटल, परचून और कंफेक्शनरी की दुकानें चला रहे हैं।
गढ़ी कोहना के रहने वाले जावेद खां बताते हैं कि उन्होंने जरदोजी का कारखाना डाला था। कारीगरी महंगी होने और मुनाफा कम होने के चलते कारोबार में घाटा होने लगा। इसके चलते एक साल पहले कारखाना बंद कर कंफेक्शनरी की दुकान खोल ली। असगर रोड मोड़ के पास चाय का होटल रखे कारखानेदार गुड्डू खान ने बताया कि जरदोजी पर छाई मंदी के चलते कारखाना बंद करना पड़ा। विकलांग हैं इसलिए जल्दी नौकरी भी नहीं मिली। मजबूरी में चाय का होटल रख परिवार का पेट पाल रहा हूं।
जरदोजी कारीगर जग्गू खां ने बताया कि जरदोजी पर छाई मंदी के चलते कारखाने में दो-दो-तीन-तीन दिन तक काम नहीं मिलता था। बच्चों का पेट पालने के लिए सब्जी की ठेली लगाकर गुजर-बसर कर रहा हूं। कारीगर इसरार खां कहते हैं कि जरदोजी की मंदी ने हाथ से कोरा, दपका और सुई छीन ली। अब मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण कर रहा हूं। कभी घरों में पुताई कर तो कभी मजदूरी कर गुजारा कर रहा हूं।