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सब कुछ वही, बस मणींद्र के सपने नदारद

Fri, 19 Jun 2015 11:28 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला फर्रुखाबाद
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गंगा कुछ ज्यादा अनमनी है। आज का यह दु:ख अपने भीतर बढ़ रही गंदगी को लेकर नहीं है। गंगा के किनारे ही मणींद्र दा की अंत्येष्टि हुई थी। शहादत से एक दिन पहले मणींद्र गंगा को शिद्दत से याद आ रहे हैं।  पांचाल घाट शमशान घाट पर ही उनका अंतिम संस्कार हुआ था। कहां, आज यह जान पाना मुश्किल  है। शुक्रवार की सुबह-सुबह ही शमशान घाट पर गंगा किनारे कई चिताएं जल रही हैं। अचानक एक चिता से चटकी लकड़ी गंगा में जा गिरती। पानी में सूं की आवाज
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निकलती है। हल्का सा धुआं उड़ने लगता है। गंगा के लिए यह घाव मणींद्र की शहादत से बड़ा नहीं है। बड़ा घाव तो यह है कि मणींद्र की शहादत के बाद शहर, जिले के बिगड़े हालात। यहां से केंद्रीय कारागार पहुंचता हूं। इसी जेल में 20 जून को 1934 को मणींद्रनाथ बनर्जी ने आखिरी सांस ली थी।

सेंट्रल जेल में आम दिनों सा माहौल है। मुलाकाती खड़े हैं। परिसर में लगी मणींद्रनाथ की प्रतिमा सन्नाटे में है। क्रांतिकारी दुर्गा भाभी की कोशिशों से 1985 में यह प्रतिमा लगी थी। हवाएं आपस में टकराती जेल की दीवारों पर बैठ जाती हैं। जेल की चार नंबर बैरक में मणींद्र रहे थे।
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तब की जेल में इंकलाब के नारे के गूंजते थेे। अब उसी जेल में कैदियों की हुकूमत चलती है। उनके पास गैरकानूनी चीजें पहुंचती हैं।  यह वही जेल है, जहां मणींद्र ने यातनाओं के बाद भी अनशन नहीं तोड़ा। हवाओं को  मणींद्र की शहादत अब जाया लगती है। 1934 की 20 जून गर्म थी। सुबह 9 बजे जेलर ने क्रांतिकारी मन्मथनाथ और यशपाल को मणींद्र की

बिगड़ती तबीयत की सूचना दी थी। अस्पताल में नंगे शरीर दो तकियों के  ऊपर वह औंधे लेटे थे। धीमे-धीमे कराह रहे थे। हालत बिगड़ रही थी। इस बीच यशपाल ने बी श्रेणी की बैरक से आडोक्लोन की शीशी मंगाई। वह मणींद्र के सीने पर आडोक्लोन मलने लगे। मणींद्र करुण ढंग से कराह रहे थे। बीच-बीच में यशपाल के प्रश्नों का उत्तर अंग्रेजी और मन्मथनाथ के सवालों का जवाब बंगला में देते थे।

मणींद्र ने 24 घंटे में दो औंस से ज्यादा पेशाब नहीं किया था। मूत्राशय बेकार हो रहा था। दोपहर बीतते-बीतते हालत और नाजुक होने लगी। सामरिक अस्पताल से ऑक्सीजन मंगाई गई। 15 मिनट तक ऑक्सीजन दी गई। तकलीफ बढ़ने पर वह मां को याद करने लगते। दोपहर 2 बजे के बाद उनके हाथ पांव सुन्न होने लगे। चार बजे उनके लिए दवा लाई गई। मन्मथनाथ दवा पिलाने  लगे। उन्हें दवा निगलने में दिक्कत हो रही थी। सांस लेने में भी तकलीफ होने लगी। सवा चार

बजे मणींद्र ने मन्मथनाथ के सीने पर अंतिम सांस ली। मणींद्र की अंत्येष्टि गंगा के किनारे शमशान घाट पर हुई थी। आज वही शहर है, वही गंगा , वहीं जेल , बस देश आजाद है। लूट, हत्या, बलात्कार, हकों में डाका है।  इस आजादी और आबोहवा में बांके जवान मणींद्र के सपने नदारद हैं।

रायबहादुर, काकोरी का ईनाम मिल गया तुम्हें!
मणींद्र के पूर्वज बंगाल से आकर बनारस में बस गए थे। मणींद्र नाथ बनर्जी का जन्म 13 जनवरी 1907 को बनारस में हुआ था। पिता ताराचंद्र बनर्जी होम्योपैथी के चिकित्सक थे। मां सुनयना क्रांतिकारी विचारों की थीं। ताराचंद्र के आठ बेटे जीवनधन, प्रभाष बाबू, मणींद्र नाथ, फ णींद्र नाथ, अमिय, भूपेंद्र, मोहित व बसंत बाबू थे। 16 साल की उम्र में मणींद्र क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन में शामिल हो गए थे। 9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल ने काकोरी के पास रेलगाड़ी का

खजाना लूटा था। इस लूट में राजेंद्र नाथ लाहिणी की भी भूमिका थी। इस केस की जांच मणींद्र के मामा सीआईडी इंस्पेक्टर जितेंद्र नाथ बनर्जी ने की थी। इन्होंने क्रांतिकारियों को फंसाया था।  इससे खुश होकर जितेंद्र को ब्रिटिश सरकार ने रायबहादुर की उपाधि दी थी। इससे मणींद्र जितेंद्र नाथ से बदला  लेने के लिए मचल उठे। 19 जनवरी 1929 को  गुदौलिया

स्थित मारवाड़ी अस्पताल के पास जितेंद्र को गोली मार दी। गोली मारने के बाद मणींद्र भाग गए। इसकेे बाद फिर लौटे। जितेंद्र के पास जाकर बोले,  रायबहादुर, काकोरी का ईनाम मिल गया तुम्हें। जितेंद्र के चिल्लाने पर लोगों ने मणींद्र को पकड़ लिया। इन्हें 10 साल की सजा सुनाई गई। इसके बाद फतेहगढ़ कें द्रीय जेल भेज दिया गया।

सुदामा और युधिष्ठिर के नाम मिले
मणींद्र को कैदी सुदामा भी कहते थे। क्रांतिकारी रमेश चंद्र गुप्त उन्हें  युधिष्ठिर कहा करते थे। सेंट्रल जेल के जेलर लाड़ली ने राजनैतिक बंदी चंद्रमा सिंह को पीट दिया था। 14 मई 1934 को सभी राजनैतिक बंदी भूख हड़ताल पर चले गए। मणींद्र ने भी भूख हड़ताल शुरू कर दी।  धमकी पर चंद्रमा सिंह ने हड़ताल खत्म कर दी। 23 मई को मन्मथनाथ ने भी हड़ताल तोड़ दी। अकेले मणींद्र भूख हड़ताल पर बने रहे थे। 20 जून 1934 को मणींद्र दा शहीद हो गए।
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