धीरेंद्र सिंह फौज से रिटायर होने के बाद से सेवा काज में लगे हैं। इन्होंने वर्ष 1997 में रेडिकल इंस्पायरिंग पब्लिक स्कूल समिति की स्थापना की। इसके माध्यम से वह विकलांगों की हर संभव मदद करते हैं। साथ ही जिले के वह नंबर वन रक्तदाता हैं। जरूरतमंदाें के लिए 1999 से लगातार रक्तदान करते चले आ रहे हैं। अब तक वह 32 बार रक्तदान कर चुके हैं। उम्र के
55वें पड़ाव पर पहुंचने के बाद भी इनके हौसले की कोई कमी नहीं है। समिति में पंजीकृत विकलांग भी इनसे प्रेरित होकर रक्तदान कर रहे हैं। रक्तदाताआें के नाम, ब्लड ग्रुप, पता व मोबाइल नंबराें की सूची इनके पास है। लोहिया अस्पताल में ब्लड डोनरों में भी इनका नाम दर्ज है। जरूरत पर यह लोगाें के लिए रक्तदान करवाने को तत्पर रहते हैं। साथ ही विकलांग पेंशन, इनके सर्टिफिकेट बनवाने के लिए भी मुस्तैद रहते हैं। अनाथ बच्चों को अपने स्कूल में मुफ्त में दाखिला दिलाते हैं।
पेंशन से चलता घर खर्च
धीरेंद्र सिंह कहते हैं कि फौजी होने के नाते मिलने वाली पारिवारिक पेंशन से वह घर खर्च और विकलांग पेंशन को वह विकलांगों पर ही खर्च करते हैं। साथ ही समाज के लोगों से भी विकलांगों के लिए मदद मांगने में नहीं चूकते हैं।
ऐसे मिली प्रेरणा
धीरेंद्र बताते हैं कि वर्ष 1995 में सेवा के दौरान कालिंदी और पुरुषोत्तम एक्सप्रेस भिड़ गई थीं। इसस दुर्घटना में वह भी घायल हो गए थे। इलाज के दौरान उन्होंने अस्पताल में सैकड़ों ऐसे लोगों को देखा, जो रक्त के अभाव में मौत के शिकार हो रहे थे। तभी से उन्होंने प्रण कर लिया था कि यदि जीवन बच गया तो इस शरीर के खून से लोगों की जान बचाने का काम करेंगे। इसी प्रेरणा के चलते वह शहर में लगने वाले रक्तदान शिविरों में शिरकत करते हैं और लोगों को दूसरों की जान बचाने के लिए रक्तदान करने के लिए प्रेरित भी करते हैं।