फर्रुखाबाद। सूरत के लहंगों से मिल रही चुनौती से निपटने के लिए फर्रुखाबादी जरदोजी के हुनरमंद नई डिजाइन तैयार करने में जुटे हैं। यह कपड़ों पर चमक बिखेरने के लिए नए अंदाज का मैटेरियल मंडियों में तलाश रहे हैं। इसके लिए हाईटेक प्रणाली का भी सहारा लिया जा रहा है। वहीं, जरदोजी जानकारों का कहना है कि सूरत के लहंगे में टिकाऊपन नहीं है।
जिले के जरदोजी कारोबार ने विदेशों में भी फर्रुखाबाद की पहचान कराई है। कपड़ों पर चमकदार बनाने वाले इस कारोबार से हजारों लोग रोजी-रोटी कमा रहे हैं। इस हुनर से न सिर्फ पुरुष, बल्कि महिलाएं भी स्वावलंबी बनकर उभरी थीं। बीते वर्ष से जरदोजी कारोबार को सूरत में मशीन से बनने वाले कढ़े लहंगों से बड़ी चुनौती मिल रही है। इसके चलते फर्रुखाबादी लहंगों की डिमांड लगातार घटती जा रही है।
बड़े व्यापारी तो जैसे-तैसे अपना स्थान बनाए हैं लेकिन मध्यम व छोटे कारोबारियों का धीरे-धीरे सिमटना शुरू हो गया है। जरदोजी कारीगरों का महानगरों में पलायन शुरू हो गया है और कुछ कारीगर दूसरे कामों में लग गए हैं। ऐसे में जरदोजी के दिग्गज कारोबारी अपना हुनर बरकरार रखने को बेताब हैं। उन्होंने नए अंदाज में डिजाइनिंग और सैंपलिंग करनी शुरू कर दी है।
जरदोजी के माहिर शुजातुल्लाह खां बताते हैं कि इस कारोबार पर उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं लेकिन जरदोजी से तैयार माल की मांग हर दौर में बनी रही है। वह कहते हैं कि सूरत के लहंगों में कोई दम नहीं है। उसकी चमक-दमक अस्थायी है। मशीन से कढ़े लहंगे, दुपट्टे सस्ते तो हो सकते हैं लेकिन टिकाऊ नहीं।
शादाब हुसैन बताते हैं कि जरदोजी बाजार में जमे रहने के लिए कारोबारी अब कोरा, दपका के साथ ही ब्राइडल आदि नए मैटेरियल से धंधे को चमकाएंगे। इसके लिए उन्होंने ऑनलाइन डिजाइनिंग और मैटेरियल की तलाश शुरू कर दी है। इससे किसी हद तक कारोबारी संभल भी रहे हैं।