फर्रुखाबाद। डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पताल की व्यवस्था आग से झुलसे मरीजों और उनके तीमारदारों की पीड़ा और बढ़ा रही है। यहां 14 कमरों में चलने वाली बर्न यूनिट एक कमरे में समेट दी गई है। इस कमरे (वार्ड) का ताला भी करीब डेढ़ महीने से नहीं खुला। यहां लगीं एसी भी हटा दी गईं। जो मरीज आते हैं उन्हें भर्ती करने की बजाय रेफर किया जा रहा है।
वर्ष 1995 में लोहिया अस्पताल बनने के साथ ही आग से झुलसे मरीजों के अच्छे उपचार के लिए बर्न यूनिट की स्थापना की गई थी। इसके 10 कमरों में 20 बेड और एसी लगे थे। चार कमरों में डॉक्टर, दवाई व अन्य स्टाफ की व्यवस्था थी। यूनिट शुरू होने से आसपास के जनपदों के मरीज भी यहां आने लगे। कुछ साल मरीजों को भर्ती कर उनका उपचार किया गया लेकिन धीरे-धीरे व्यवस्था बिगड़ी चली गई।
कोरोना की पहली लहर में यहां आइसोलेशन वार्ड बना और अब पीकू वार्ड संचालित हो रहा है। यहां लगे एसी भी दूसरी जगह शिफ्ट कर दिए गए। अस्पताल प्रशासन ने दूसरी मंजिल पर टीबी वार्ड के पास के कमरे में छह बेड डालकर बाहर बर्न वार्ड लिखकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया।
आग से झुलसे मरीजों के लिए सबसे जरूरी एसी और मच्छरदानी तक वार्ड में नहीं हैं। करीब डेढ़ माह से इस वार्ड का ताला तक नहीं खोला गया। हालात यह हैं कि अस्पताल में आग से झुलसे जो भी मरीज आते है, उन्हें कुछ लोशन लगाने के बाद सर्जन न होने की बात कहकर रेफर कर दिया जाता है।
तीन माह में इमरजेंसी में आए 26 मरीज
लोहिया अस्पताल की इमरजेंसी ओपीडी में 21 अप्रैल से 20 मई तक नौ, 21 मई से 20 जून तक 10 और 21 जून से 20 जुलाई तक सात मरीज आए। इन इन 26 मरीजों में सिर्फ दो को रजिस्टर पर भर्ती होना दिखाया गया है, शेष सभी मरीजों को रेफर किया गया।
एक साल से सर्जन बिना चल रहा अस्पताल
लोहिया अस्पताल में डॉ. गौरव मिश्रा नियमित और डॉ. इमरान अली संविदा पर सर्जन के रूप में तैनात थे। करीब डेढ़ साल पहले डॉ. गौरव मिश्रा का स्थानांतरण हो गया और एक साल पहले डॉ. इमरान अली की संविदा समाप्त हो गई। इसके बाद अस्पताल में कोई भी सर्जन नहीं आया। लिहाजा न तो ऑपरेेशन हो रहे और न ही झुलसे लोगों का इलाज मिल रहा है।