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Farrukhabad News: नहाए-खाए के साथ कल से छठ महापर्व

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फोटो- 13, पांचाल घाट गंगा तट पर समतलीकरण का कार्य करवाते पूर्वांचल विकास समिति के पदाधिकारी। स्रोत: जागरुक पाठक
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- पांचाल घाट पर जेसीबी से कराई गई घाटों की सफाई
संवाद न्यूज एजेंसी
फर्रुखाबाद। प्रकृति और सूर्य की उपासना का लोक आस्था का महापर्व छठ 25 अक्तूबर से नहाए-खाए के साथ प्रारंभ होगा। पर्व को लेकर शहर में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से जुड़े लोगों में गहरी श्रद्धा और उत्साह देखने को मिल रहा है। महिलाएं और पुरुष पूजा सामग्री जुटाने व घाटों की तैयारी में व्यस्त हैं।
पांचाल घाट पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए घाटों की सफाई और समतलीकरण का कार्य जेसीबी से कराया जा रहा है। पूर्वांचल विकास समिति के अध्यक्ष केदार शाह ने बताया कि शनिवार को नहाए-खाए के साथ व्रत की शुरुआत होगी। इस दिन व्रती महिलाएं चने की दाल, लौकी और भात का प्रसाद बनाती हैं।
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रविवार को खरना का आयोजन होगा, जिसमें व्रती महिलाएं गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण कर 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं। सोमवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य और मंगलवार को उदयाचलगामी सूर्य को अर्ध्य देने के साथ यह व्रत पूर्ण होगा। इस मौके पर डॉ. शमीम अहमद खां, एनडी प्रसाद, ब्रजभूषण सिंह, हरेंद्र दुबे, रामबाबू शाह, अजीत भट्ट आदि उपस्थित रहे।
ठेकुआ के प्रसाद की विशेष महत्ता


फोटो-14, सीमा शाह

राजीव गांधी नगर निवासी सीमा शाह बताती हैं कि छठ महापर्व पर साफ-सफाई का विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके प्रसाद की तैयारी में व्रती महिलाएं खास ध्यान रखती हैं। ठेकुआ के प्रसाद की विशेष महत्ता रहती है।



बांस से तैयार डाला का प्रयोग
फोटो-15, दुर्गा देवी

फतेहगढ़ के नगला नैन निवासी दुर्गा देवी ने बताया कि छठ महापर्व में बांस से बना डाला सूर्य देव को अर्ध्य देने के समय प्रयोग किया जाता है। डाला में ठेकुआ, गन्ना, सिंघाड़ा, मूली, शकरकंद, मौसमी सब्जियां और फल होते हैं।



पूजन के सात प्रकृति संरक्षण का भी संकल्प लेते
फोटो-16, उर्मिला भट्ट

मोहल्ला गीतापुरम निवासी उर्मिला भट्ट कहतीं हैं कि सूर्य देव का पूजन करते हुए प्रकृति संरक्षण का भी संकल्प लेते हैं। छठ महापर्व के प्रारंभ होने के समय शरद ऋतु से भी शुरू हो जाता है। ऐसे में प्रकृति के परिवर्तन का भी आभास होता है।
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लोगों का नदियों से भी जुड़ाव होता है
फोटो-17, रीना सिंह

नेकपुर कलां की रीना सिंह ने बताया कि छठ महापर्व लोगों को प्रकृति के करीब ले जाने जाता है। महापर्व पर नदी, तालाब, जलाशय में खड़े होकर अर्ध्य देने की परंपरा है। इसलिए लोगों का नदियों से भी जुड़ाव होता है।
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