फर्रुखाबाद। आप अपनी पुश्तों में से किसी का नाम भूल रहे हैं तो पंडा हाजिर हैं। बुजुर्ग पंडाें को अपने यजमानों की पुश्ताें के सिजरा में से सारे नाम जुबानी याद हैं। युवा पंडाें ने इन्हें अपनी बही में दर्ज कर रखा है। मेला में प्रदेश भर से 105 पंडाें में अपने डेरे बनाए हैं।
पंडों की बही में यजमानाें के परिजनाें का लेखाजोखा दर्ज रहता है। बच्चे के जन्म, परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु व यजमान के परिवार में आई नई बहू भी इनके खाते में दर्ज हो जाती है। बही को अपडेट करने के लिए यह गांवों में सालाना चक्कर लगाते हैं। पंडों का काम यजमानों को गंगा पूजन करवाना है। घाट पर सत्यनरायण की कथा भी यह करवाते हैं। कुर्रिया कला शहजहांपुर के बुजुर्ग पंडा रमेश चंद्र कहते हैं कि यह काम पुश्तैनी है। तीन पीढ़ियों से परिवार में पंडागीरी हो रही है। 1950 से यजमानों की बही तैयार है। नई पीढ़ी में बेटा जितेंद्र सीख गया है। कन्नौज के श्रवण कुमार बताते हैं कि बाबा हरदयाल के बाद पिता गंगाराम ने उनकी विरासत संभाली। अब यह विरासत उनके पास है। पंडों के निशान ही इनकी पहचान हैं। यह निशान इनकी कई साखों से चले आ रहे हैं। यजमानाें को भी यह निशान याद हैं। बांस के ऊंचे झंडाें पर झाडू, कमंडल, बाल्टी, लोटा, रंग बिरंगी झंडियाें से यजमान इनकी पहचान करते हैं। पंडाें के आपसी कानून के तहत पहले से प्रचलित निशान का प्रयोग कोई दूसरा पंडा नहीं कर सकता है। जय मां भागीरथी पंडा समिति के अध्यक्ष मनोज कुमार का कहना है कि ऐसे मामले सामने आने पर समिति इनका समझौते के तहत निराकरण करवा देती है।