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दुर्दशाग्रस्त मिनी सचिवालयों पर दबंग काबिज

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ग्राम पंचायतों में बने मिनी सचिवालय दुर्दशा के शिकार हैं। अधिकांश पर दबंगों का कब्जा है। कई में भूसा भरा है तो कई मिनी सचिवालय तबेले में तब्दील हैं। लाखों की लागत से बने इन भवनों पर प्रशासन की भी नजर नहीं पहुंच रही है। अब हालात यह हैं कि वर्षों बीतने के बाद भी जिला पंचायत द्वारा हस्तांतरण न किए जाने से पंचायती राज विभाग भी इन भवनों को अपना नहीं मान रहा है।
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ग्राम पंचायत स्तर पर विकास कार्यों का प्रस्ताव बनाने के लिए खुली बैठक करने का प्राविधान है। इसके लिए लाखों रुपये की लागत से मिनी सचिवालयों (पंचायतघर) का निर्माण कराया गया। इसकी निर्माण की जिम्मेदारी जिला पंचायत विभाग के पास थी।

शासन की मंशा थी कि खुली बैठक कर सर्वसम्मति से विकास कार्यों के प्रस्ताव लिए जाएं। इसके आधार पर ग्राम पंचायतों में विकास हों। जनपद की 600 ग्राम पंचायतों में करीब दो सैकड़ा पंचायतघर बने हैं। प्रत्येक भवन में एक कार्यालय, पंचायत सचिव का आवास, खुली बैठक के लिए हाल आदि का निर्माण कराया गया। इसके बाद किसी विभाग ने इनकी ओर मुड़कर नहीं देखा।
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लाखों की लागत से बने इन पंचायत भवनों में एक दिन भी खुली बैठक नहीं की गई और न ही कभी पंचायत सचिव इनमें झांकने तक गए। विभागीय सूत्रों के अनुसार जिला पंचायत ने पैक्सफेड को निर्माण की जिम्मेदारी दी थी। एक भवन के निर्माण में करीब 17 लाख रुपये की लागत आई थी।

अब हालात यह हैं कि देखरेख के अभाव में पंचायत घर दुर्दशा के शिकार होकर जर्जर हो गए हैं। अधिकांश पर ग्रामीणों का कब्जा है। राजेपुर ब्लाक क्षेत्र के परतापुर कला गांव के जर्जर पंचायत भवन के परिसर में उपले पाथे जा रहे हैं और यही उपले अंदर भर दिए जाते हैं।

वहीं लीलापुर का सचिवालय अन्ना मवेशियों की शरणस्थली बना है। जबकि लभेड़ा गांव का सचिवालय जर्जर हो चुका है। इनके अलावा तमाम पंचायत भवन निजी उपयोग में लिए जा रहे हैं।

जिला पंचायत राज अधिकारी अमित कुमार त्यागी ने बताया कि पंचायत भवनों का निर्माण जिला पंचायत से पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि से कराया गया था। यह भवन उनके विभाग को हस्तांतरित ही नहीं किए गए हैं। इससे उन्हें भवनों की संख्या तक की जानकारी नहीं है।

जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी नरेंद्र पाल सिंह ने बताया कि उनकी छह माह पूर्व तैनाती हुई है। पंचायत भवन निर्माण की योजना 2015 में बंद हो चुकी है। जिले में कितने भवन हैं, हस्तांतरण की प्रक्रिया क्या रही, उनके संज्ञान में नहीं है। वह विभाग से फाइल तलाश कर देखेंगे। मतगणना के बाद स्थिति का अवलोकन कर इस पर निर्णय लिया जाएगा।
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दुर्दशाग्रस्त मिनी सचिवालयों पर दबंग काबिज

लाखों रुपये से हुआ निर्माण, वर्षों बाद भी हस्तांतरण नहीं
पंचायत भवनों में नहीं होती ग्राम पंचायतों की खुली बैठक
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