फर्रुखाबाद। यदि आपकी उम्र 40 के पार है, हाई ब्लड प्रेशर और शुगर के मरीज हैं, आंखों में परेशानी है तो जांच जरूर करवा लें। दरअसल 40 की उम्र के बाद ग्लूकोमा (काला मोतिया) का खतरा ज्यादा रहता है। लोहिया अस्पताल की ओपीडी में ग्लूकोमा के हर माह करीब 50 से 60 मरीज आ रहे हैं। लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से जनवरी को ग्लूकोमा माह मनाया जा रहा है।
आमतौर पर ग्लूकोमा के शुरूआती लक्षणों को पहचानना काफी मुश्किल होता है, लेकिन जैसे-जैसे यह रोग बढ़ता जाता है आंखों की ऊपरी सतह और देखने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। इससे अंधापन भी हो सकता है। काले मोतिया या मोतियाबिंद के दौरान आंख की मस्तिष्क को संकेत भेजने वाली ऑप्टिक तंत्रिकाएं बुरी तरह प्रभावित होती हैं और उनकी क्षमता कम हो जाती है। इससे दूसरी आंख पर अधिक दबाव पड़ता है। यह स्थिति काफी खतरनाक होती है। यह बहुत जरूरी है कि आप ग्लूकोम की पहचान शुरूआती अवस्था में कर लें, क्योंकि एक बार ग्लूकोमा पूरी तरह होने के बाद इसको ठीक करना काफी मुश्किल हो जाता है। समय रहते यदि ग्लूकोमा के लक्षणों की पहचान कर ली जाए तो मरीज को नेत्रहीन होने से बचाया जा सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर के करीब 70 करोड़ लोग ग्लूकोमा से ग्रस्त हैं। वहीं, इस रोग के संबंध में हुए सर्वे और अनुसंधान से पता चला था कि देश में लगभग एक करोड़ 20 लाख लोग ग्लूकोमा के शिकार हैं।
क्या है ग्लूकोमा
यह आंखों की बीमारी है। इसे आम भाषा काला मोतिया भी कहा जाता है। आंख गुब्बारे की तरह होती है इसमें एक तरल पदार्थ भरा होता है। यह तरल पदार्थ आंखों के अंदर बनता रहता है, ग्लूकोमा में यह तरल पदार्थ आंखों से बाहर नहीं निकल पाता। इससे आंखों पर दबाव बनने लगता है। आंखों पर पड़ा दबाव आपके नर्व को डैमेज करने लगता है। इससे रोशनी कम होने लगती है।
बार-बार चश्मे का नंबर बदलना भी है संकेत
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय यादव ने बताया कि चश्मे का नंबर बार-बार बदलना, अंधेरे में देर से नजर आना, रोशनी में अलग-अलग रंग दिखना, ग्लूकोमा के संकेत हो सकते हैं। देश में इस रोग के बारे में जागरूकता बहुत कम है। लेकिन सतर्कता बरतने पर इससे बचा जा सकता है। जो व्यक्ति स्टेरॉयड का किसी भी रूप में इस्तेमाल करता है उसे ग्लूकोमा का खतरा अधिक होता है
फर्रुखाबाद में नहीं है ग्लूकोमा का इलाज
देश भर में जनवरी को ग्लूकोमा माह जरूर मनाया जा रहा है। लेकिन जिले के लोहिया अस्पताल में भी ग्लूकोमा का कोई इलाज नहीं है। वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सर्वेश यादव ने बताया कि प्रतिदिन ग्लूकोमा के मरीज तो आते हैं लेकिन यहां पर महज जांच ही हो सकती है। इसके बाद उन्हें इलाज के लिए बाहर भेज दिया जाता है।