पहले आम चुनाव से अब तक मतदान में कई बदलाव हो चुके हैं। मतपेटियां गायब हो गईं हैं। प्रचार प्रसार का तरीका बदल गया है। अब चुनाव काफी हद तक तकनीक पर निर्भर होने लगा है।
इस बीच केवल एक चीज है जिसने अपना स्थान बरकरार रखा है। वह है अंगुली में लगने वाली स्याही। वह आज भी जस की तस अपनी जगह पर मौजूद है।
1951 में देश में पहली बार मतदान हुए थे। पहली बार मतदान को लेकर देश की जनता में बहुत उत्साह था, लेकिन तब मतदान करने के लिए न ही ईवीएम की कोई व्यवस्था थी। न ही मुहर लगाने की।
उस समय सभी प्रत्याशियों के नाम की मतपेटियों का उपयोग होता था। वोटर अपने पसंद के प्रत्याशी की मतपेटी में अपना मत डाल देता था। इसके बाद अलग-अलग मतपेटी से वोटों की गिनती हो जाती थी।
1957 में हुए लोकसभा चुनाव में भी यही प्रक्रिया जारी रही। 1962 में पहली बार मतदान की व्यवस्था में बदलाव किया गया। दरअसल अब चुनाव में प्रत्याशियों की संख्या में इजाफा हो गया था।
ऐसे में इतनी ज्यादा संख्या में मतपेटियों को इधर-उधर ले जाना आसान नहीं था। साथ ही वोट इधर-उधर होने की आशंका भी रहती थी। इसी को देखते हुए 1962 में पहली बार मुहर और कॉमन मतपेटी की व्यवस्था की गई।
अब लोग मतपत्र पर अपने पसंद के प्रत्याशी के सामने मुहर लगा कर उसे कॉमन मतपेटी में डाल देते थे। बाद में मुहर के हिसाब से जीत हार का निर्णय हो जाता था। मतदान की यह प्रक्रिया काफी लंबे समय तक चली।
इसके बाद 1999 के चुनाव में आयोग ने मतदान प्रक्रिया को सहज बनाने के लिए ईवीएम (इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) से परिचय कराया। इससे मतदान करना आसान हो गया।
बस अपनी पसंद के प्रत्याशी के सामने का बटन दवाओ अंगुली में स्याही लगवाओ और जाओ। इससे वोटों की गिनती करना भी आसान हो गया। साथ ही मतदान करना भी।
2017 यूपी के विधानसभा चुनाव में पहली बार चुनाव आयोग ने वीवीपैट की शुरुआत की। इसमें व्यक्ति को अपना वोट कहां गया है यह भी पता चल जाता है।
इसके अलावा इस चुनाव में चुनाव आयोग ने कई तरह की एप्लीकेशन व पोर्टल आदि चालू किए हैं। इसमें शिकायत से लेकर सुझाव तक व जनसभा आदि की परमीशन लेने तक के सभी काम किए जा सकते हैं।
इस दौरान मतदान को लेकर अंगुली पर लगने वाली स्याही में अब तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। 1952 के पहले चुनाव में भी मतदाता की अंगुली पर स्याही लगाई जाती थी। वह अभी भी लगाई जा रही है।
देश के विभिन्न हिस्सों में मतदान के लिए अभी भी कॉमन मत पेटी वाली प्रक्रिया को अपनाया जा रहा है। गांव की प्रधानी व निकायों के चुनाव में अब भी कॉमन मतपेटी के जरिए चुनाव कराया जाता है।
सब बदला न बदली तो स्याही
1951 के पहले आम चुनाव से अब तक मतदान में हो चुके हैं कई बदलाव
स्याही ने अपना स्थान आज भी रखा बरकरार
पहले चुनाव में ना मुहर थी ना ही ईवीएम