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अयोध्या की जीत से नए सियासी समीकरण बनने के आसार

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अयोध्या। जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर सपा को हरा कर मिली जीत से भाजपा ने जिले की राजनीति में एक बड़ा सियासी संदेश दिया है। भाजपा की जीत से जिले में नए सियासी समीकरण बनने के आसार दिखने लगे है। इससे मिलने वाले सियासी नफा नुकसान को अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
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चुनाव के पहले तक कहा जा रहा था कि भाजपा के पास केवल आठ जिला पंचायत सदस्य हैं जबकि सपा की तरफ से 17 डीडीसी चुनाव जीत कर आए थे। इसके अलावा चार बसपा और 11 डीडीसी निर्दलीय थे। शनिवार को हुए मतदान के बाद जब चुनाव परिणाम सामने आया तो पांसा पलटा दिखा। भाजपा के रणनीतिकारों ने कुशल चुनावी प्रबंधन से 30 सदस्यों का समर्थन पाकर ऐतिहासिक जीत हासिल की। जीत का दावा कर रही सपा प्रत्याशी को अपने सपा के 17 से डीडीसी में से सिर्फ 10 का ही समर्थन मिल पाया। सपा से इंदूसेन को मैदान में उतारे जाने के पीछे भी जिले की राजनीति में जुझारूपन के लिए चर्चित रहे स्व. मित्रसेन यादव की पृष्ठभूमि का भी कोई लाभ मिलता नहीं दिखा।
सत्तासीन भाजपा के पास जिले में सांसद सहित सभी विधान सभा की सीटों के साथ मेयर की कुर्सी भी पहले से थी लेकिन जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी न होने की टीस पार्टी के लोगों को रहती थी। इस जीत से भाजपा ने सालों पुराने इस दंश को भी खत्म कर दिया। प्रतिष्ठा का प्रश्न बनी अयोध्या की सीट झोली में न आने पर बड़े स्तर पर भाजपा किरकिरी हो सकती थी। इस जीत ने पंचायत चुनाव में मिली शिकस्त पर भी काफी हद तक पर्दा डाल दिया। जिले की राजनीति से जुड़े वरिष्ठों की माने तो इस जीत का सियासी नफा नुकसान अब दोनों ही दलों को विधानसभा चुनाव में देखने को मिलेगा। इससे जहां कुछ पुराने चेहरों की चमक फीकी होगी वही कुछ नए चेहरों को सियासत में चमकने का मौका मिलेगा।
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