अयोध्या। गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड में नवम गुरू तेग बहादुर का 346वां बलिदान दिवस पूरी श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर गुरुद्वारे के मुख्य ग्रंथी ज्ञानी गुरूजीत सिंह व महंत बलजीत के संयोजन में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर गुरू ग्रंथ साहब का अखंड पाठ भी हुआ। इसमें तोरागी जत्थों ने लयबद्ध शबद कीर्तन से गुरू तेगबहादुर को नमन किया। मुख्यग्रंथी ज्ञानी गुरूजीत सिंह ने कहा कि उनके त्याग व समर्पण से सभी को सीख लेनी चाहिए।
मुख्यग्रंथी ने कहा कि सनातन परंपरा को बचाने, अक्षुण्ण रखने के लिए गुरू तेगबहादुर ने वो कर दिखाया जो उन्हें दूसरों से अलग करता है। उन्होंने धर्म की रक्षा की खातिर अपना शीश दे दिया लेकिन जुल्म नहीं सहा। उनका बलिदान अविस्मरणीय रहेगा। बताया कि विक्रम संवत 1725 में असम से पंजाब जाते समय गुरू तेग बहादुर अयोध्या के ब्रह्मकुंड गुरुद्वारे में ठहरे थे। उन्होंने दो दिन तक यहां रहकर तप किया था। उनकी चरण पादुका स्मृति स्वरूप आज भी गुरुद्वारे में मौजूद है।
कहा कि गुरू के बलिदान के मूल में यह चेतना थी कि इस जीवन के अलावा एक महाजीवन भी है जो मृत्यु के बाद भी प्रवाहमान रहता है। ज्ञानी चरनजीत सिंह ने कहा कि गुरू तेगबहादुर के जीवन से परहित की सीख मिलती है, उनकी स्म़ृति सदैव अक्षुण्ण रहेगी। दिगंबर अखाड़ा के महंत सुरेश दास ने कहा कि नवम गुरू ने बलिदान देकर देश का सांस्कृतिक गौरव बचाया। इस अवसर पर लखनऊ से आए रागी जत्थे ने शबद कीर्तन किया।