अयोध्या। राममंदिर की नींव का निर्माण अब इंजीनियरिंग फिलिंग प्रणाली से किया जाएगा। पहले राफ्ट स्टोन प्रणाली से नींव बनाई जानी थी लेकिन, गहन अध्ययन के बाद पाया गया कि यह प्रणाली राममंदिर की नींव के लिए सफल साबित नहीं होगी। यह बातें राममंदिर के वास्तुकार आशीष सोमपुरा ने कहीं। सोमपुरा शुक्रवार को राममंदिर निर्माण समिति की बैठक के बाद अहमदाबाद लौटने से पहले अमर उजाला से खास बातचीत कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि 95 प्रतिशत प्राचीन मंदिरों में नीचे पत्थर की बीम ही होती है। ऐसे मंदिरों की जमीन सॉलिड होती है और लोड ले सकती है। वर्ष 1500 में यहां मंदिर था, फिर वो दबा, उसके बाद जो बना है फिर वो भी दबा, फिर एक नया ढांचा खड़ा हो गया, वह भी टूट गया यह सब कुछ होता रहा। जिसके चलते यहां की मिट्टी सॉलिड नहीं है। एएसआई ने 5 से 7 मीटर खोद दिया था, उससे भी मिट्टी दब गई।
इन सारी चीज को देखना है। यहां सालिड मिट्टी ढूंढना अलग ही परिस्थिति है। 50 फिट नीचे गहराई तक पत्थरों का सॉलिड कंस्ट्रक्शन किया जाए तो मंदिर से भी तीन गुना लोड उस पत्थर से हो जाएगा। ये सब चीजें इंजीनियरिंग के जरिए साल्व की जा रही हैं। सोमपुरा ने कहा कि हमारी 15 पीढ़ियों का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट राममंदिर है। एलएंडटी सहित अन्य तकनीकी एजेंसियों ने राममंदिर की नींव के लिए राफ्ट स्टोन प्रणाली का अध्ययन किया तो पाया कि यह प्रणाली राममंदिर की नींव के काम में सफल नहीं होगी।
इसलिए इस प्रणाली से मंदिर निर्माण की योजना को निरस्त कर दिया गया है। अब इंजीनियरिंग प्रणाली से ही मंदिर की नींव बनेगी। नींव के लिए 350 फीट लंबाई व 250 फीट चौड़ाई के क्षेत्र में खोदाई की जाएगी। हर मिट्टी की अलग-अलग ताकत होती है, उसी अनुसार डिजाइन बनानी पड़ती है। चूंकि राममंदिर की मिट्टी भुरभुरी एवं बलुई है ऐसे में इंजीनियरिंग प्रणाली ही नींव के लिए ठीक रहेगी।
इस प्रणाली के तहत खोदाई के बाद पत्थरों की लेयर बिछाई जाएगी। उसके बाद उस पर कंकरीट, लाइम, सीमेंट, केमिकल से मजबूत किया जाएगा। फिर इसके ऊपर पत्थरों की लेयर बिछाई जाएगी, फिर मैटेरियल लगाए जाएंगे। इसी तरह से फाउंडेशन का निर्माण होगा। बताया कि नींव की प्लिंथ करीब 16 फीट की होगी। ग्राउंड व मंदिर के बीच की जगह को प्लिंथ कहते हैं। प्लिंथ की मजबूती पर ही नींव की मजबूती आधारित होती है।
उन्होंने बताया कि नींव की मजबूती के लिए पत्थरों में कौन सा मैटेरियल मिलाया जाए इस पर एलएंडटी के इंजीनियर मंथन कर रहे हैं। मिर्जापुर के पत्थर हार्ड होते हैं इसलिए नींव के लिए राजस्थान के गुलाबी पत्थरों की बजाय मिर्जापुर के पत्थरों का ही प्रयोग होगा। फाउंडेशन बनने के बाद सबसे ऊपर नींव की सुंदरता बढ़ाने के लिए राजस्थान के गुलाबी पत्थर लगाए जाएंगे। सरयू की धारा से बचाने के लिए 70 एकड़ के मंदिर परिसर के पश्चिमी ओर रिटेनिंग वॉल बनेगी।
आशीष सोमपुरा ने बताया कि राममंदिर को मौसम की मार से बचाने के लिए उस पर विशेष कोटिंग भी की जाएगी। कोटिंग हो जाने पर मंदिर के पत्थरों की सुंदरता शताब्दियों तक सुरक्षित रहेगी। रामजन्मभूमि में पांच एकड़ में परकोटे का निर्माण किया जाना है, लेकिन परकोटा निर्माण शुरू होने में अभी समय लगेगा। आर्किटेक्ट आशीष सोमपुरा ने बताया कि नींव बनने के बाद परकोटे का निर्माण शुरू होगा। ताकि मंदिर निर्माण के लिए मशीनों को लाने में कोई दिक्कत न हो।
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बताया कि दो दिवसीय बैठक में रामजन्मभूमि की सुरक्षा को लेकर भी कई अहम निर्णय लिए गए हैं। राममंदिर की सुरक्षा व्यवस्था में भी कुछ परिवर्तन संभव है। रामजन्मभूमि क्षेत्र को नो फ्लाइंग जोन घोषित करने की तैयारी है। हालांकि इसका निर्णय सिक्योरिटी के अधिकारियों को लेना है। मंदिर परिसर में भक्तों की सुविधाओं को लेकर भी चर्चा की गई है।
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बताया कि गुरुवार को रामलला के गर्भगृह स्थल पर नींव खोदाई का काम हम सभी ने भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने के बाद शुरू करा दिया है। बताया कि गर्भगृह स्थल पर अब प्रतिदिन मंदिर निर्माण होने तक पूजा की जाएगी। भूमिपूजन के बाद से ही यहां शाम को दीपक जलाने का क्रम चलता रहा है। बताया कि खोदाई के बाद तय की गई डिजाइन के अनुसार बुनियाद डालने का काम शुरू होगा, हमें प्राकृतिक मिट्टी मिलने का इंतजार रहेगा।
चंपत राय ने बताया कि रामंमदिर निर्माण के लिए समर्पण अभियान चल रहा है। इसी क्रम में शुक्रवार को राममंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र की मौजूदगी में टाटा कंसल्टेंट के वरिष्ठतम अधिकारी रमेश जी ने भी अपने परिवार की ओर से दस हजार की राशि राममंदिर के लिए समर्पित की है।