जबकि पर्वत और उस पर बने मंदिरों की कभी भी ढहने की चेतावनी का बोर्ड लगा प्रशासन ने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली है। यह चेतावनी बोर्ड कई सालों से है, लेकिन बचाव कोई उपाय नहीं हो रहे हैं।
साधु-संतों ने अपने खर्चे से जैसे-तैसे कुछ मरम्मत की। जबकि पुरातत्व विभाग से संरक्षित इस पर्वत को बचाने के लिए अभी लापरवाही हो रही है। पुरातत्व विभाग ने यहां आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के मद्देनजर केंद्र सरकार से जल्द से जल्द पर्वत को बचाने के लिए मरम्मत व संरक्षण बजट का प्रस्ताव भेजा है।
मणिपर्वत ऐतिहासिक व पुरातात्विक धरोहर है। सदियों से इसी पौराणिक स्थल से धर्मनगरी का प्रसिद्ध सावन झूला मेले का आगाज होता है। प्रतिवर्ष सावन मास भर लाखों श्रद्धालुओं का तांता दर्शन-पूजन के लिए उमड़ता है।
हालात यह है कि ऐतिहासिक धरोहर का भवन वर्ष दर वर्ष, दिन प्रति दिन जर्जर व कमजोर होता जा रहा है। संरक्षित स्मारक को सुरक्षित करने व लाखों श्रद्धालु भक्तों की सुरक्षा की सुधि न तो शासन को है और न ही प्रशासन को।
सहायक अधिकारी, पुरातत्व संरक्षण डीके जायसवाल ने कहा कि मणिपर्वत ही पुरातत्व के लिए संरक्षित क्षेत्र है। अयोध्या के इस टीले पर बन रहे अवैध भवनों का दबाव इसके क्षरण का कारण है।
टीले की जर्जरता से इसके गिरने का आशंका जताई गई है। आला अधिकारी निरीक्षण कर चुके हैं। केंद्र सरकार को इसके संरक्षण के लिए प्रस्ताव हाल ही में भेजा गया है।
मेला के दौरान श्रद्धालुओं को खतरे से बचाने के लिए बैरिकेडिंग आदि इंतजाम कर प्रशासन 25-25 की संख्या में लोगों को आगे जाने की इजाजत देता है। ताकि हादसे के दौरान जनहानि रोकी जा सके। वैसे बगैर संरक्षण कार्य के खतरा मोल नहीं लेना चाहिए।
मेलाधिकारी व एडीएम सिटी, फैजाबाद रामनिवास शर्मा का कहना है कि मणिपर्वत की जर्जर स्थिति से प्रशासन अवगत है। इसके लिए चेतावनी के बोर्ड काफी पहले से लगाए गए हैं।
मेले के दौरान ज्यादा भी एक साथ न जाए। इसे रोकने को बैरीकेडिंग कर सुरक्षा के इंतजाम रहेंगे। इसी के साथ-साथ आपात स्थिति से निपटने के सभी इंतजाम भी मौके पर रहेंगे।