सजाने-संवारने के लिए इसे पालिका को हस्तांतरित किया जाना था। प्रशासन की ओर से फाइल साल भर पहले शासन को भेजी तो गई, लेकिन अब तक न तो निर्णय हुआ और न कोई जवाब मिला।
करीब 20 साल पहले इंदिरा मत्स्य बिहार लोगों व बच्चों के आकर्षण का केंद्र हुआ करता था। विशाल झील में पैडल बोट चलाकर बच्चे, बड़े और युवा आनंद लेते थे। मछली घर (एक्वेरियम) में रंग-बिरंगी मछलियां दर्शकों को देखकर शीशे के अंदर से कुलेल करती थीं।
समय के थपेड़ों ने सब कुछ बदहाली की भंवर में धकेल दिया। प्रशासन की देखरेख के अभाव में झील को जलकुंभी निगल गई और मछलियां मर गईं। झील में तैरती पैडल बोट कहां चली गईं? पता ही नहीं।
जुलाई 2014 में इंदिरा मत्स्य बिहार का निरीक्षण तत्कालीन मंडलायुक्त विपिन कुमार द्विवेदी व नगर पालिका चेयरमैन विजय कुमार गुप्त ने किया था। आयुक्त ने बैठक में इंदिरा मत्स्य बिहार को पुनर्जीवित करने का निर्देश दिया था।
इसके लिए इसे पालिका को हस्तांतरित किया जाना था। इसके बाद नगर पालिका झील की जलकुंभी साफ कराती। विशाल झील में पैडल मोटर बोट उतारी जातीं। झील के चारों ओर रोडलाइट जगमग होती।
बच्चों के लिए झूला लगाने के साथ ही एक्वेरियम में फिर रंगीन मछलियां तैरती नजर आतीं। उसी समय शासन से निर्देश पाने की फाइल लखनऊ भेजी गयी थी, लेकिन इसका जवाब अब तक नहीं मिला है।
नगर पालिका चेयरमैन विजय कुमार गुप्त का कहना है कि मंडलायुक्त रहे विपिन कुमार द्विवेदी 24 जुलाई 2014 की सायं निरीक्षण के बाद हस्तांतरण का फैसला किया था। फाइल उसी के बाद शासन को भेजी गई थी।
पालिका इस झील और मत्स्य बिहार को सजाने संवारने के लिए आज भी फाइल लौटने और हस्तांतरण होने के इंतजार में है। इतना ही नहीं वह इंदिरा मत्स्य बिहार के लिए मत्स्य विभाग को 20 प्रतिशत किराया भी देने को तैयार हैं।