क्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस की फाइलें गुमनामी बाबा का रहस्य खोल सकेंगी? इसे लेकर लोगों को खासी उम्मीदें हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को नेता जी के जन्मदिवस पर देश के सामने कई दस्तावेज ला सकते हैं।
यहां गुमनामी बाबा उर्फ भगवन जी को नेताजी सुभाषचंद्र बोस मानने वालों को प्रधानमंत्री से उम्मीद तो है मगर आजादी के पूर्व के सरकारी दस्तावेजों से नहीं, बल्कि आजादी के बाद की उन 137 फाइलों को लेकर है, जिसमें गुमनामी बाबा को लेकर तमाम खुफिया रिपोर्ट बताई जा रही है।
गुमनामी बाबा उर्फ भगवन जी को सबसे करीब से जानने वाले शहर के झारखंडी मोहल्ला निवासी डॉ. आरपी मिश्र हैं। वे गुमनामी बाबा के राज हमेशा सीने में दफन करने वालों में से थे। लेकिन अब चाहते हैं कि सरकार उनका सच तार्किक परिणाम तक सामने लाए।
डॉ. मिश्र 1975 से ही गुमनामी बाबा के भक्त बने थे, वहीं उन्हें अयोध्या में प्रचारित होने के बाद 1983 में ‘रामभवन’ में उनके लिए दो कमरे किराये पर लेने वाले शख्स थे।
वे बताते हैं कि भगवान जी किसी से मिलते नहीं थे, एकान्त में रहते थे, पर्दे के पीछे से ही लोगों से बातचीत करते और रात के अंधेरे में ही उन्हें जानने वाले उनसे मिलने आते थे।
यहां तक कि उनके मकान-मालिक गुरुबसंत सिंह भी दो वर्षों में सामने से उनका चेहरा नहीं देख पाए। उनकी देखभाल के लिए सरस्वती देवी अपने बेटे राजकुमार मिश्रा के साथ रहती थीं।
16 सितंबर 1985 को गुमनामी बाबा का देहांत हुआ, तो उनके शिष्यों ने 18 सितंबर को बाकायदा तिरंगे में उनका पार्थिव शरीर लपेटकर सरयू तट के गुप्तार घाट पर तेरह लोगों की उपस्थिति में अन्तिम संस्कार कर दिया।
अंतिम संस्कार के बाद सेविका सरस्वती देवी से बात करने वाले रामतीर्थ विकल कहते हैं कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन जांच नेताजी की मौत से शुरू होकर गुमनामी बाबा कौन थे, इसकी होनी चाहिए।
बताते हैं कि गुमनामी बाबा की मौत के कुछ दिन बाद उनके शिष्यों में दो गुट बना, एक गुट जिसमें सरस्वती देवी भी थीं, इस बात को लेकर नाराज थीं कि मरने के बाद गुमनामी बाबा के चेहरे पर तेजाब क्यों गिराया गया।
तो दूसरा गुट गुमनामी बाबा की अंतिम इच्छा कि उन्हें कोई पहचान न सके, शव को किसी को न सौंपा जाए, इस शपथ को शिद्दत से पूरा करने वाला था। मगर अब प्रधानमंत्री मोदी से उम्मीद है कि सच सामने लाएंगे।
रामभवन के निवासी और बचपन में बाबा का दुलार पाने वाले शक्ति सिंह बताते हैं कि बाबा खुद का नाम भगवन बताते थे, बोलते कम थे। 16 सितम्बर 1985 को उनकी मौत हो गयी, जिनको कोलकाता से आए उनके शिष्यों ने यहां के गुप्तार घाट के पास अंतिम संस्कार कर दिया।
बाद में जब उनके कमरे की तलाशी ली गई तो वहां मिले सामानों ने पुख्ता कर दिया कि गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोस थे। कहते हैं कि तीन-तीन कमेटियां इस मामले की जांच के लिए बनाई गईं, लेकिन उनकी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई, जैसे सच सामने लाने की मनाही हो।
2013 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके सामान को संग्रहालय में रखने और सच सामने लाने के लिए एक रिटायर जज की कमेटी बनाने का आदेश दिया था, लेकिन न जाने क्यों अमल नहीं हुआ।
उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से काफी उम्मीद है, मगर सार्थक तब होगा, जब वे आजादी के बाद नेताजी के जीवित होने को लेकर खुफिया जांच की 137 फाइलें देश के सामने लाएंगे। इन्हीं फाइलों से गुमनामी बाबा का रहस्य सामने आ सकता है।