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Dengue: डेंगू जांच के लिए इंतजाम नाकाफी, बारिश के पानी के जगह-जगह जमाव से बढ़ता जा रहा कहर

Sat, 29 Oct 2022 01:55 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या

सार

अयोध्या जिले में डेंगू की जांच के इंतजाम काफी नहीं हैं। जिला अस्पताल में भीड़ लगी रहती है। बारिश के बाद जगह-जगह हुए जलभराव के बाद बीमारी का कहर बढ़ता जा रहा है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : istock
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विस्तार
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अयोध्या जिले में इन दिनों डेंगू का प्रकोप तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसके इलाज के तो कमोवेश इंतजाम हैं, लेकिन जांच की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। सिर्फ जिला मुख्यालय पर ही डेंगू की एलाइजा जांच हो रही है। निजी केंद्रों की जांच रिपोर्ट विभाग पुष्ट नहीं मानता है। जिले की आबादी मौजूदा समय में करीब 29 लाख है। इनमें करीब 70 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती हैं। कई ऐसे विकासखंड भी हैं, जिनकी दूरी मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर से अधिक है। इन दिनों बरसात के बाद जगह-जगह जमे पानी में पनपे डेंगू के मच्छर लोगों को डंक मार रहे हैं। मौजूदा समय में डेंगू पीड़ितों की संख्या 438 हो गई है।

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लोगों के इलाज के लिए तो शहर से लेकर ग्रामीणांचल तक व्यवस्था है, लेकिन डेंगू की जांच के लिए मुकम्मल इंतजाम नहीं हैं। हर बार स्थिति भयावह होने के बावजूद ग्रामीणांचल तक डेंगू की जांच की व्यवस्था कराने के लिए कोई पहल नहीं हो रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार डेंगू की जांच दो तरह से होती है। एक तो किट/कार्ड से की जाती है, जिसे डेंगू की एनएस-1 जांच कहा जाता है। इसमें आईजीजी आईजीएम की जांच होती है। इस कार्ड से होने वाली जांच में आईजीजी पॉजिटिव होने पर ही रोगी को डेंगू पॉजिटिव मान लिया जाता है। इस रिपोर्ट को स्वास्थ्य विभाग अधिकृत नहीं मानता है, बल्कि अधिकृत जांच के लिए एलाइजा जांच कराई जाती है। यह जांच एलाइजा रीडर से की जाती है। इसमें खून के नमूने से इंफेक्शन की मात्रा की रीडिंग की जाती है। उसी आधार पर रोगी का उपचार किया जाता है। अब खास बात है कि जिस जांच को स्वास्थ्य महकमा अधिकृत मानता है, उसकी जांच सिर्फ जिला अस्पताल और राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज में होती है।
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29 लाख की आबादी के इस जिले में बहुत से लोग सुदूर तराई इलाके में रहते हैं, जहां मच्छर जनित रोगों का प्रकोप रहता है। लोग इसकी चपेट में आते हैं तो सीएचसी पर जांच के लिए जाते हैं। वहां पर पहले कार्ड से जांच की जाती है और पॉजिटिव आने पर एलाइजा जांच के लिए जिला मुख्यालय रेफर किया जाता है। ऐसे में रोगी बार-बार नमूना देने, मुख्यालय तक का चक्कर लगाने या मुख्यालय आने पर भी वहां की ओपीडी के मरीजों की भीड़ होने समेत तमाम परेशानियों से बचने के लिए एलाइजा जांच न कराकर डेंगू का उपचार शुरू कर देते हैं। इस तरह एलाइजा जांच न होने से मरीज चिह्नित भी नहीं हो पाते हैं। बाद में यदि मरीजों की मौत भी हो जाती है तो एलाइजा जांच के अभाव में मौत को डेंगू से हुई मौत नहीं माना जाता है।

जिले में प्रतिदिन 140 मरीजों के एलाइजा जांच की व्यवस्था है। जिला अस्पताल में एक एलटी इसकी जांच करता है। प्रतिदिन 80-90 नमूने यहां पर लिए जाते हैं। करीब पांच-छह घंटे तक एक साथ जांच की जाती है। जिसकी रिपोर्टिंग व लिखा-पढ़ी में काफी समय बीत जाता है। वहीं, मेडिकल कॉलेज में भी करीब 40-45 नमूनों की जांच हो पाती है। इससे अधिक मरीज मिलने पर या तो उन्हें अगले दिन बुलाया जाता है। या फिर वह निजी केंद्रों पर कार्ड से जांच करवाकर निजी अस्पतालों में अपना उपचार कराते हैं। निजी केंद्रों पर कार्ड से होने वाली जांच के 16 सौ रुपये लिए जाते हैं। जबकि पुष्ट एलाइजा जांच 2600 रुपये में की जाती है।

देवकाली रोड स्थित एक प्रतिष्ठित पैथोलॉजी केंद्र के अनुसार अब तक किसी भी व्यक्ति ने एलाइजा जांच नहीं कराई है, जबकि एनएस-1 जांच के लिए भीड़ रहती है। डेंगू पीड़ितों को इलाज के साथ-साथ कीवी फल, नारियल पानी आदि का सेवन करने की सलाह दी जाती है। इस समय डेंगू के प्रकोप के कारण एकाएक इन फलों के दामों में इजाफा हो गया है। सामान्य दिनों में 60 रुपये में मिलने वाला नारियल इन दिनों 100 रुपये तक मिल रहा है। वहीं, कीवी फल का दाम 25 रुपये से बढ़कर 40 रुपये हो गए हैं।

सीएमओ डॉ. अजय राजा का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र के अस्पतालों में डेंगू की जांच रैपिड कार्ड से की जाती है, उसमें पॉजिटिव आने पर एलाइजा जांच के लिए रेफर किया जाता है। एलाइजा जांच की निशुल्क व्यवस्था जिला अस्पताल व मेडिकल कॉलेज में है। इसकी किट काफी महंगी आती है।

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