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अपने ही वोटरों को नहीं सहेज पाई भाजपा

Tue, 16 Feb 2016 11:57 PM IST
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूरो
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बीकापुर विधानसभा उपचुनाव में डेढ़ साल पहले हुए लोकसभा चुनाव के परिदृश्य का कतरा भी नहीं दिखा। कारण चाहे कुछ भी रहा हो लेकिन भाजपा अपने ही वोटों को सहेजने में नाकामयाब रही। उसके लिए न तो प्रधानमंत्री मोदी का नाम काम आया और न ही केंद्र सरकार से कराए जा रहे काम।
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कमल के प्रति लोगों का आकर्षण भी कम हो गया। बालू की दीवार की तरह भाजपा का पूरा का पूरा सिराजा ढह गया। सोहावल विधानसभा का अस्तित्व समाप्त होने के बाद बीकापुर विधानसभा बनने के बाद अब तक बीकापुर विधानसभा में यह तीसरा चुनाव है। यहां के मतदाताओं का मन लगातार बदलता रहा।

कभी सपा को को जिताया तो फिर भाजपा के  सिर पर ऐतिहासिक बढ़त दे दी लेकिन डेढ़ साल बाद इस उपचुनाव में एक बार फिर मतदाताओं ने जनादेश बदल दिया। मतदाताओं के सिर से भाजपा का जादू छूमंतर हो गया।
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बीकापुर विधानसभा के सृजन के बाद सन 2012 के विधानसभा चुनाव में बीकापुर के मतदाताओं ने समाजवादी पार्टी के सिर जीत का सेहरा बांध दिया। सपा से मैदान में उतरे मित्रसेन यादव को 55211 वोट मिले तो भाजपा के अनिल तिवारी को जनता ने नकारते हुए 13667 पर सिमटा दिया।

इस चुनाव में बसपा भी मैदान में थी। इसके प्रत्याशी फिरोज खां उर्फ गब्बर को 53332 वोट मिले थे। उस समय भी मुन्ना सिंह चौहान कांग्रेस के समर्थन से  चुनाव मैदान में थे उनको 37500 वोट मिले थे। मतदाताओं का मूड कब और कैसे बदल जाए इसका उदाहरण लोकसभा चुनाव रहा।

सन् 2014 में लोकसभा चुनाव में मोदी लहर यहां कुछ इस तरह प्रभावी हुई कि यहां के मतदाताओं ने भाजपा को सिर चढ़ा लिया। इस विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी लल्लू सिंह को 103957 वोट मिले जबकि सपा से 2012 में चुनाव जीते सपा विधायक मित्रसेन यादव ही प्रत्याशी थे लेकिन उनके वोट भी इस आंधी में उड़ गए और उन्हें 36419 वोट मिले।

इस चुनाव में सपा, बसपा के साथ कांग्रेस के वोट भी मोदी लहर में शामिल हो गए। बसपा प्रत्याशी जितेंद्र सिंह बब्लू को 25096 तो कांग्रेस के डॉ. निर्मल खत्री को 24157 मत मिले थे। लोकसभा चुनाव को हुए महज डेढ़ साल हुए हैं। लेकिन मोदी लहर का अता पता नहीं रह गया।

विधायक रहे मित्रसेन यादव की मौत से रिक्त हुई बीकापुर विधानसभा में एक लाख से ज्यादा वोट पाने वाली भाजपा महज 12 हजार पर सिमट गई। जिले में भाजपा के लिए यह तगड़ा झटका है। शायद यही कारण है कि कमल के प्रति उसके अपने वोटरों का आकर्षण भी कम हो गया।
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