संत कंवरराम प्रवेश द्वार से ही झलकेगी सिंधी संस्कृति : कुलपति
फैजाबाद। डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित ने कहा कि भाषाएं संस्कृति की संवाहक होती हैं, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ले जाती हैं। सिंधी भाषा का अपना एक समृद्ध इतिहास रहा है। इसे जब से देवनागरी से जोड़ा गया तब से इसे काफी विस्तार मिला है। ठीक उसी प्रकार जैसे तुलसी का धार्मिक ग्रंथ रामचरितमानस आज आम जनमानस के बीच बसा हुआ है।
वे बुधवार को कौटिल्य प्रशासनिक भवन में अमरशहीद संत कंवरराम साहिब सिंधी अध्ययन केंद्र की ओर से सिंधी भाषा दिवस पर एक गोष्ठी आयोजित की में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सिंधी भाषा को समृद्ध बनाने की संकल्पना को उजागर करते हुए बताया कि यह केंद्र ऐसा विकसित किया जाएगा इसमें प्रवेश करने पर सिंध की अनुभूति होगी व सिंध की संस्कृति की छवि दिखाई पड़ेगी। इसके पहले सिंधी समाज की पंचायत में संत कंवरराम मिशन, सिंधी सेवा मंडल, भक्त प्रह्नलाद सेवा समिति, भारतीय सिंधु सभा एवं सिंध लेडीज क्लब के स्थानीय प्रतिनिधियों ने कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित को सिंधी भाषा विकास पुरुष की संज्ञा देकर सम्मानित किया।
साहित्यकार सुदामा सिंह ने कहा कि सिंधी भाषा अपने आप में बड़ी धरोहर को संजोए हुए है। सिंध का इतिहास पूरे विश्व के लिए एक अनूठा उदाहरण सदियों से बना हुआ है। वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर सफरीवाला ने सिंधु घाटी की सभ्यता के इतिहास को प्रस्तुत करते हुए कहा कि 63 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में समृद्ध संस्कृति की झलक आज भी दिखाई पड़ती है। विश्वविद्यालय कार्यपरिषद के सदस्य ज्ञाप्रटे ने कहा कि 1947 में देश को आजादी मिली और सिंध समाज को विभाजन झेलना पड़ा। इसका सकारात्मक पक्ष यह रहा कि हम अपनी जड़ो से तो कटे लेकिन पूरे देश से जा मिले। इस अवसर पर आईआईटी के पूर्व निदेशक प्रो. एलके सिंह, प्रो. आरएल सिंह, मुख्य नियंता प्रो. आरएन राय, प्रो केके वर्मा, प्रो. जसवंत सिंह, डॉ अशोक राय, संत कंवरराम मिशन के साई महेशलाल, साई महेंद्र कुमार सहित सिंधी समाज के प्रबुद्ध वर्ग उपस्थित रहे।