फोटो संख्या 31 पेड़ में लगा ककोरा का फल
- फोटो : ETAWHA
चकरनगर। चंबल के बीहड़ों में अंधाधुंध लकड़ी कटान से ककोरा विलुप्त होता जा रहा है। आमतौर पर जगह-जगह रास्तों में मिलने वाला ककोरा जंगलों में भी ढूंढने पर नहीं मिल रहा है। इससे सब्जी की इस फसल की दुकानों पर ऊंचे दामों में बिक्री हो रही है।
सावन-भादों में बीहड़ी गांवों में ककोरा की सब्जी घर-घर में बनती थी। घरों में सब्जी की टोकरी में ताजे ककोरा रखे नजर आते थे। कारण यह कि जगह-जगह ककोरा की बेल उगने से बहुतायत में ककोरा की पैदावार होती थी। बीहड़ी लोग जंगल से ककोरा तोड़कर बाजारों में बेचकर अच्छी-खासी कमाई कर लेते थे।
बीहड़ के लोग बरसात के दिनों में जंगल से एकत्र किए गए ककोरा शहर में बेचकर परिवार पालते थे। अब हालात यह हैं कि सारा दिन बीहड़ में भटकने के बाद भी घर की सब्जी लायक ककोरा नहीं मिलता है।
ग्रामीणों का कहना है कि जंगलों में अंधाधुंध लकड़ी कटान से ककोरा की बेल टूट जाती है। जब बेलें फैलेंगी ही नहीं तो फल कहां से उगेगा। सब्जी की दुकानों पर ककोरा 150 से 180 रुपये किलो बिक रहा है, जो आम आदमी की पहुंच से बाहर है।
चिकित्सक हर ज्ञान सिंह ने बताया कि ककोरा बहुत ही लाभकारी और औषधिपूर्ण होता है। ककोरा खाने से तमाम रोग शरीर में नहीं लगते हैं। बरसात में ककोरा खाने से पेट में विकार नहीं होता और प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। इसको सब्जी बनाकर या कच्चा खाया जा सकता है। ककोरा का जूस शुगर और ब्लड प्रेशर में भी बेहद कारगर है।