राहतपुरा ग्राम स्थित श्री शंकर नेत्र चिकित्सालय में चल रही श्रीराम कथा के दूसरे दिन हरिद्वार से आए महामंडलेश्वर स्वामी बालयोगी अर्जुनपुरी महाराज ने समाज, धर्म, परिवार और राजनीति के पतन पर चिंता जताई। उन्होंने लोगों से समाज को बुराइयों से बचाने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाने की अपील की।
स्वामी जी ने श्रीराम चरित मानस क्या है? यह हमें क्या सिखाती है। मानस ग्रंथ के प्रति हमारा क्या दायित्व है, हमारा व्यवहार कैसा हो? इस संबंध में बताया। उन्होंने कहा कि रामायण यह भी सिखाती है कि गृहस्थ जीवन, सामाजिक, आध्यात्मिक और धार्मिक जीवन कैसा हो?
उन्होंने कहा कि मानस के पात्रों से हमें यह भी सीखने का अवसर मिलता है कि पति-पत्नी के प्रति व्यवहार कैसा हो, भाई-भाई के प्रति, सास-बहू के प्रति, सेवक-स्वामी के प्रति, राजा-प्रजा के प्रति कैसे आदरणीय और मधुर संबंध व व्यवहार हों। इतना सब कुछ अन्य ग्रंथों में सरलता से नहीं मिलता है।
उन्होंने कहा कि श्रीराम चरित मानस का अध्ययन न करने से नंगापन और बुजुर्गों की उपेक्षा बढ़ रही है। यदि हम केवल गाये रटें और आरती उतारते रहेंगे तो मानस के जीवन मूल्य हमारे आचरण और व्यवहार को नियंत्रित और परिवर्तित नहीं कर सकते। हमें श्रेष्ठ विचारों और व्यवहारों को जीवन में उतारने की साधना करनी चाहिए और कर्म और आचरण में ढालना चाहिए।
स्वामी जी ने कहा कि कुछ भ्रष्ट राजनीतिक समाज को विभिन्न जातियों, वर्गों में बांटने का कुचक्र रच रहे हैं और धीरे-धीरे वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न की जा रही है। सनातन धर्मियों को हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख आदि के अलग-अलग वर्गों में विभाजित करने की साजिश की जा रही है।
हमें अपने देश की रक्षा के लिए, धर्म की मर्यादा के लिए, समाज के उत्थान के लिए, विश्व शांति के लिए इन पथभ्रष्ट राजनीतिज्ञों के कुचक्र से बचने का उपाय गंभीरतापूर्वक तलाशना है। ताकि जाति, संप्रदाय, भाषा के विवाद समाप्त हों और भारत अखंडता को प्राप्त कर सके।
इस मौके मानस वंदना के पश्चात स्वामी जी, संजय शास्त्री, प्रभुनाथ पांडेय, ज्ञान मिश्रा, प्रदीप शुक्ला, बैजनाथ, प्रमोदानंद वेदांती आदि का माल्यार्पण कर डा. विद्याकांत तिवारी, महेश चंद्र तिवारी, मुन्नालाल वर्मा, श्याम सुंदर दीक्षित, डा. अशोक दीक्षित, श्रीप्रकाश गुप्ता, विनोद दीक्षित आदि ने स्वागत किया।