जिले में सपा का दबदबा बरकरार है, लेकिन जनता ने कई दिग्गजों को दरकिनार कर दिया है। सपा की सियासत में धुरी बनने का दंभ भरने वालों के परिजनों को जनता ने नकार दिया है। जिला पंचायत सदस्य पद के सभी नतीजे सामने आ चुके हैं।
सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी चुनाव नतीजों को लेकर भले ही अपनी वाहवाही करने में जुटी हो परंतु ताजा नतीजे सियासी हवा का रुख बदलने के संकेत दे रहे हैं। चुनाव नतीजों की बयार ने राजनीतिक फिजा में यह संदेश देने की कोशिश की है कि सपा का अभेद्य दुर्ग में कहीं न कहीं दरार पड़ी है।
सपा के रणनीतिकारों के माथे पर चिंता की लकीरें भी इसकी पुष्टि कर रही हैं। कुल 24 सीटों में सिर्फ 13 पर सपा के वे प्रत्याशी जीते हैं जिन्हें पार्टी ने अधिकृत रूप से समर्थन दिया था। पंचायत चुनाव में जिस प्रकार से बसपा और भाजपा ने पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, उससे अब अन्य संभावनाओं को भविष्य के लिए तलाशने का मौका भी इन दलों को मिल गया है।
वैसे जिला पंचायत हो अथवा क्षेत्र पंचायत जिले की अधिकांश सीटों पर सपा ही काबिज होती रही है। पिछले चुनाव में जिला पंचायत की 21 सीटों में लगभग सभी सदस्य समाजवादी पार्टी के ही समर्थक थे। कमोबेश यही स्थिति पिछले काफी समय से चली आ रही थी।
वर्ष 2015 के चुनाव में बसपा और भाजपा को भी सदन में बैठने का मौका मिलने जा रहा है। जिला पंचायत में अब अपना भी दखल होने से दोनों दलों के नेता खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। वहीं समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जसवंतनगर, सैफई और बसरेहर में तो सपा का डंका बजा।
भरथना, ताखा, बढ़पुरा में डंके की आवाज कम होती सुनाई दी। वहीं महेवा, चकरनगर में तो आवाज गुम ही हो गई। यह क्षेत्र भरथना विधानसभा क्षेत्र के हिस्से में आता है। यहां से सुखदेवी वर्मा सपा की विधायक हैं। महेवा में पूर्व सांसद प्रेमदास कठेरिया का दखल रहता है।
वे एक बार जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुके हैं, फिर भी महेवा की पांच और चकरनगर की दो कुल सात सीटों में सपा को केवल एक सीट पर ही संतोष करना पड़ा। सपा के दिग्गज माने जाने प्रत्याशी सौरभ प्रकाश त्रिपाठी, चंद्रमोहन यादव, बापू सहेल सिंह परिहार, आशीष राजपूत अपनी अपनी सीट गंवा बैठे।
सपा के लिए जिला पंचायत अध्यक्ष पद का रास्ता तो मुश्किल होता नहीं दिखता। क्यों कि 24 सदस्यों में सपा के 13, भाजपा- बसपा के 2-2 एवं 7 निर्दलीय जीते हैं। निर्दलीयों में सबसे ज्यादा तादाद सपा के बागियों की है। जिन्हें सपा अपने पाले में कर ही लेगी। इसलिए बहुमत का कोई संकट नहीं है।
लेकिन चुनाव नतीजों ने मतदाताओं के अंतर्मन की बात जरूर बयां कर दी है। जिनकी भाषा को सपा के रणनीतिकारों को समझना होगा।