जिले में राइस मिलों के फिर से चलने की उम्मीद जगी है। सोमवार को जिले में सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट मैसूर (सीएफटीआरआई) की टीम आएगी। यह टीम धान के उत्पादन और यहां पैदा होने वाले धान की गुणवत्ता जांचेगी। टीम की रिपोर्ट पर राइस मिल उद्योग का भविष्य टिका है। क्योंकि टीम की रिपोर्ट के आधार पर ही सरकार रिकवरी प्रतिशत बढ़ाने पर निर्णय करेगी। अभी इस इलाके में 62 में से 41 राइस मिलें बंद हैं। इटावा जिले की भरथना, इटावा, जसवंतनगर और सैफई तहसील क्षेत्र को धान का कटोरा कहा जाता था। यह क्षेत्र धान की पैदावार के लिए पूरे प्रदेश में मशहूर था। इसी वजह से भरथना में चावल की रैक लगती थी। इस तहसील में पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा राइस मिलेें थीं। एक दशक पहले जिले में 62 राइस मिलों में से 43 भरथना में ही थीं। राइस मिलर्स मंडी से आढ़तियों के माध्यम से सीधे धान खरीद करते थे। इसके बाद लेवी के माध्यम से 60 प्रतिशत चावल सरकार को देते थे। बाकी 40 प्रतिशत चावल खुले बाजार में बेचने की अनुमति थी। पांच-छह साल पहले सरकार ने लेवी चावल लेना बंद कर दिया। यहीं से समस्या पैदा होने लगी। लेवी बंद होने से एक एक करके राइस मिलर्स ने धान की खरीद से अपने हाथ खींचने शुरू कर दिए। इसके बाद सरकार एफसीआई एवं पीसीएफ के जरिये राइस मिलर्स को धान खरीद कर देने लगी। बदले में रिकवरी के आधार पर 67 फीसदी चावल राइस मिलर्स वापस इन्हीं एजेंसियों को करने लगे। राइस मिलर्स को आढ़तियों से सीधे खरीद का अधिकार छिन गया। धान की कुटाई का 10 रुपये प्रति क्विंटल का चार्ज राइस मिलर्स को मिलने लगा। राइस मिलर्स इस व्यवस्था से संतुष्ट नहीं थे। यही कारण रहा कि राइस मिल उद्योग से उन्होंने मुंह मोड़ना शुरू कर दिया। इस समय जिले में 62 में 21 राइस मिलें चल रहीं है। बाकी 41 मिलें बंद हो चुकी हैं। इनमें कुछ मिलों ने जमीन पर प्लाटिंग करके बेच दी है। कुछ ने मैरिज हाल बनवा लिया है। भरथना में 43 में से केवल 18 मिलें काम कर रहीं हैं।