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आजादी के क्रांतिकारियों के गांव बंसरी और नीमरी उपेक्षित

Sat, 24 Jan 2015 11:55 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
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आजादी की लड़ाई में सर्वस्व न्यौछावर करने वालों की यादें आखिर कब तक गुमनामी का शिकार रहेंगी। पारपट्टी क्षेत्र के बंसरी और नीमरी गांव इस बात के गवाह बने हैं। इन गांवों को शहीद ग्राम घोषित किया जाना चाहिए। लेकिन वह उपेक्षा का शिकार हैं। जबकि इस क्षेत्र में आज भी यह किस्से लोगों की जुबान पर रहते हैं। ग्रामीणों को गर्व है कि आजादी की जंग में उनके पुरखों की सक्रिय भूमिका रही। अब शासन-प्रशासन अनदेखी कर रहा है तो उंगलियां उठना तो स्वाभाविक है।
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इसी गांव के अनुसूचित जाति के जांबाज जीता ने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे। अंग्रेज हुक्मरान इस जीता से इस कदर खौफजदा रहे कि उन्होंने न सिर्फ पूरे क्षेत्र की संपत्ति जब्त कर ली थी बल्कि कई लोगों कोे काला पानी तक की सजा सुनाई दी थी।

आजादी की क्रांति को गति देने वाले भरेह स्टेट के राजा रूप सिंह की अगुवाई में उक्त दोनों गांवों के ग्रामीणों ने जिस साहस के साथ अंग्रेजों से युद्ध किया। वह सरकारों को भले ही न दिखें। लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज उल्लेख को कोई मिटा नहीं सकता। यह बात अलग है कि इन पन्नों को उलटने का न तो सरकार को और न ही नेताओं के पास समय है।
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आजादी की लड़ाई में जातिवाद एवं संप्रदायवाद का कोई स्थान नहीं था। बंसरी गांव के क्षत्रियों के साथ जीता बाबू जाटव ने राजा रूप सिंह की अगुवाई में अंग्रेजों में जो खौफ पैदा किया। उसे भुलाया नहीं जा सकता। परंतु दुखद यह कि सेनानियों की शहादत की बदौलत सत्ता का सुख भोगने वालों ने इन वीर जांबाजों को पूरी तरह विस्मृत कर रखा है।

पारपट्टी क्षेत्र की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में रहते हुए भी राजा रूप सिंह एवं चकरनगर के राजा निरंजन सिंह जूदेव ने अपने सीमित संसाधनों से जिस प्रकार से अंग्रेजों से लोहा लिया। उसे नेता बेशक भूल गए, यहां के लोग नहीं भूले हैं। बंसरी गावं के पूर्व प्रधान भानु प्रताप सिंह परिहार कहते हैं कि आजादी के रणबाकुंरों पर सरकार को गर्व हो या न हो। यहां के वाशिंदों को जरूर है।

राजा निरंजन सिंह जूदेव के वंशज राजा हिम्मत सिंह जूदेव का कहना है कि चकरनगर स्टेट को अंग्रेजों ने सिर्फ इसलिए वीरान कर दिया था। क्योंकि राजा निरंजन जूदेव ने उनकी गुलामी स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। वर्ष 1857 से लेकर 1860 तक अंग्रेजों से लगातार युद्ध करने के बाद सेनानियों को गिरफ्तार कर काला पानी भेज दिया गया।

ऐसे जांबाजों के नामों का सरकारी दस्तावेजों में कहीं कोई नाम तक दर्ज नहीं है। उनकी कुर्बानी का उन्हें यही इनाम मिला है। इस क्षेत्र के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सुविधाएं मिलना तो दूर उन्हें सम्मान तक नहीं दिया जा रहा है। बंसरी, नीमरी, चकरनगर स्टेट इसका जीता जागता उदाहरण हैं।
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