कुछ दिन मौसम खुशगवार रहने के बाद शुक्रवार की रात से बर्फीली सर्दी ने फिर से तीखे तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। सर्द हवाओं के बीच लोग घरों से निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं वहीं कुछ बदनसीब ऐसे भी हैं जो खुले में रात काट रहे हैं।
न तो इनके पास छत है और न ही इन्हें सरकारी व्यवस्थाओं की ‘गर्मी’ ही मिल रही है। अफसरों की फाइलों में भले ही सर्दी से बचाव के माकूल इंतजाम हों, लेकिन जमीनी स्तर पर भीषण सर्दी से निराश्रित लोगों को बचाने का कोई इंतजाम नजर नहीं आ रहा है।
निराश्रितों की तरह ही यात्रियों का भी इस सर्दी में हाल बेहाल हो रहा है। बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन पर पर्याप्त इंतजाम न होने से यात्री ठिठुरने को मजबूर हैं।
सर्दी की शुरुआत हुई तो अफसरों ने बंद कमरों में मीटिंग करके निराश्रित लोगों को सर्दी के सितम से बचाने की कार्य योजना तैयार की। अफसरों को प्रदेश सरकार की ओर से भारी भरकम बजट भी दिया गया। कागजों में इंतजाम पर्याप्त दिखाकर अफसरों ने फाइलों को भी शासन तक भेज दिया।
जनवरी का महीना शुरू हो गया है, लेकिन अभी तक शहर भर में कहीं पर भी कोई ऐसा इंतजाम नजर नहीं आया जहां ऐसा लगा हो कि यहां निराश्रित और गरीब सर्द रात गुजार सकते हैं। शुक्रवार की रात को बर्फीली हवाओं के कारण लोगों को गलन भरी सर्दी बेहाल करती रही।
तापमान लुढ़ककर 5.2 डिग्री पहुंच गया, जबकि अधिकतम तापमान 18.2 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया। सर्दी से बेहाल निराश्रित और यात्री रेलवे स्टेशन से लेकर बस स्टैंड पर ठिठुरते रहे।
शहर में अभी तक रैन बसेरा नहीं बनाया गया। नगर पालिका जेल वाले सैय्यद बाबा की मजार के पास रैन बसेरा होने का दावा करती है। यहां रैन बसेरा बना है, लेकिन यह निराश्रित और सर्दी से बेहाल यात्री या फिर राहगीरों के लिए नहीं है। इस रैन बसेरा पर रिक्शा चालकों का कब्जा है।
हाड़कंपाऊ सर्दी में मरीजों के साथ जिला अस्पताल में आने वाले तीमारदार भी सर्द रातों में बेहाल हो रहे हैं। तीमारदारों के लिए जिला अस्पताल में रैन बसेरा तो बना है, लेकिन यहां भी सर्दी के बचाव के इंतजाम नहीं हैं। कारण यह है कि रैन बसेरा में आगे जाली लगी हुई है।
जाली से आने वाली हवा यहां ठहरने वालों कंपकंपाती रहती है। ऐसे में तीमारदार यहां ठहरने की बजाय या तो वार्ड में जगह ढूंढते हैं या फिर किसी कोने में रात काटने का इंतजाम करते हैं।
शुक्रवार की रात हाड़कंपाऊ सर्दी लोगों को बेहाल करती रही। इसके बाद भी अलाव ठंडे नजर आए। रेलवे स्टेशन पर सुबह के वक्त अलाव न जलने से यात्री बेहाल रहे। अधिकांश चौराहों पर अलाव नजर नहीं आए। बस स्टैंड तिराहे पर लकड़ी थी, जो जलाई नहीं गई थी।