बीमारियों का पता लगाने के लिए एक्सरे, सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई का सहारा लिया जाता है। इसके लिए चिकित्सक और तकनीकी स्टाफ को नई-नई खोजों की जानकारी भी होनी चाहिए।
इससे इमेंजिंग टेक्नोलॉजी में आ रहे तकनीकी बदलाव की जानकारी मिलेगी। यह बात रिम्स के निदेशक डा. (ब्रिगेडियर) टी. प्रभाकर ने कही। वह यूपी ग्रामीण आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान (रिम्स) के रेडियोलॉजी विभाग में रेडियोलॉजिकल एवं इमेंजिंग टेक्नोलॉजी पर एक दिवसीय सीएमई कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि अभी फ्लोरोस्कोपी, एंजियोग्राफी, एमआरआई, पीईटी, अल्ट्रासाउंड की मदद से इमेंजिंग टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ बीमारियों का पता लगाते हैं। इमेंजिंग टेक्नोलॉजी की सहायता से बीमारियों का पता आसानी से लगाया जा सकता है।
इस मौके पर विभागाध्यक्ष प्रो. एके गुप्ता ने कहा कि मेडिकल क्षेत्र में इमेंजिंग टेक्नोलॉजी का उपयोग सिर्फ एक्सरे करने तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि कैंसर और ट्यूमर पैशेंट की रेडियोथेरेपी और कीमोथैरेपी में भी इसकी बहुत बड़ी भूमिका है।
कार्यशाला में आईएसआरटी के जनरल सेक्रेटरी सुरेश मलायथ तथा सीएमई के सेक्रेटरी सुनील सक्सेना ने बताया कि सीएमई में रेडियोलॉजिकल एंड इमेजिंग टेक्नोलॉजी से मरीजों को रेडिएशन से बचाने, एडवांस एक्सरे इमेजिंग तथा इम्पार्टेंट ऑफ पैशैंट कान्सेंट इन रेडियोलॉजिकल इनवेस्टिगेशन में भी सफलता मिलेगी।
इससे पहले कार्यशाला का उद्घाटन निदेशक और विभागाध्यक्ष के साथ प्रो. एएस माथुर, न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डा. रमाकांत यादव, डा. कैलाश मित्तल, प्रो. पन्नीर सेलवम, सुरेश मलायथ, सुनील सक्सेना आदि ने द्वीप प्रज्ज्वलित कर किया।
इस मौके पर लक्ष्मीकांत तिवारी, आशुतोष सिन्हा, सुशील बुट्टन, राजीव कृष्णा, उजमा खान, मोहम्मद अरफात, संजय सिंह, अनिल यादव, मोहम्मद जहीरूद्दीन, सौम्या राय आदि ने रेडियोलॉजिकल एवं इमेंजिंग टेक्नोलॉजी से संबंधित विषयों पर प्रकाश डाला।