भक्तों ने भगवान शिव की पूजा और दूध से अभिषेक कर शनिवार को नाग पंचमी मनाई। प्रसाद के रूप में लाई और चना अर्पित किया।
कोरोना संक्रमण की वजह से बड़े मंदिरों के कपाट बंद रहे। लिहाजा लोगों ने घर तथा मोहल्लों के मंदिरों में पूजा अर्चना की।
महिलाओं ने घरों के बाहर दरवाजे पर नाग देवता की आकृति बनाकर उनसे घर परिवार पर सदैव दृष्टि बनाए रखने की कामना की।
गली मोहल्ले में सपेरे सुबह से ही लोगों को नाग देवता के दर्शन कराने को घूम रहे थे। दोपहर के समय महिलाओं ने सावन के गीतों के दौरान झूलों का आनंद लिया। कृष्णापुरम कालोनी में नीतू यादव, वैष्णो यादव, दीक्षा यादव, रिया यादव, उपासना यादव आदि ने झूला झूला।
उदी में बिजली घर के सामने उदय नगर कॉलोनी में लोगों ने पेड़ पर पड़े झूलों का आनंद लिया। राजा शर्मा ने बताया हर साल की तरह इस बार भी झूला डाला है, जिसका सभी आनंद ले रहे हैं। बताया दिन में आदमी व बच्चे झूलते और रात में महिलाएं झूला झूलती हैं।
महेवा कस्बा में लोगों ने शिवलिंग की पूजा अर्चना की और नाग देवता का स्मरण किया। पूर्व बीडीसी कमला दुबे ने बताया अब पहले जैसी बात नहीं रह गई है। फिर भी सावन में झूला न पड़े ऐसा भी नहीं होता।
दूसरी और कथा प्रवक्ता डॉ. मयंक चतुर्वेदी ने बताया कि नाग पंचमी को व्रत करने व कथा पढ़ने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। नाग पंचमी को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं।
नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है इसका वर्णन कई तरह से किया गया है। भविष्यपुराण के अनुसार, जब सागर मंथन हुआ था तब नागों को अपनी माता की आज्ञा नहीं मानने पर श्राप मिला था। कहा गया था कि व नाग राजा जनमेजय के यज्ञ में जलकर भस्म हो जाएंगे। इससे नाग घबरा गए थे।
श्राप से बचने के लिए सभी नाग ब्रह्माजी की शरण में पहुंचे। ब्रह्माजी ने सारी बात सुनकर कहा कि जब नागवंश में महात्मा जरत्कारू के पुत्र आस्तिक होंगे, वही नागों की रक्षा करेंगे। यह उपाय ब्रह्माजी ने पंचमी तिथि को बताया था। जब महात्मा जरत्कारू के पुत्र आस्तिक मुनि ने नागों को यज्ञ में जलने से बचाया था तब सावन की पंचमी तिथि थी।
आस्तिक मुनि ने नागों के ऊपर दूध डालकर उन्हें बचाया था। इसके बाद आस्तिक मुनि ने कहा था कि जो कोई भी पंचमी तिथि पर नागों की पूजा करेगा, उसे नागदंश का भय नहीं रहेगा। तब से ही सावन की पंचमी तिथि पर नाग पंचमी मनाई जाती है। इसके अलावा कई और कथाएं हैं।