सुरक्षित प्रसव कराने जिला महिला अस्पताल आने वाली
महिलाअाआेओंं की जान से खिलवाड़ किया जा रहा है। अस्पताल में तैनात स्टाफ
की कामचोरी किसी भी गर्भवती या नवजात पर भारी पड़ सकती है।
यहां
तैनात स्टाफ ने अपना सारा काम नर्सिंग की ट्रेनिंग ले रही छात्राओं पर थोप
दिया है। छात्राएं गर्भवती ही नहीं नवजात को भी इंजेक्शन लगा रही हैं।
तजुर्बा
न होने से इनके लगाए इंजेक्शन दर्द दे रहे हैं। यदि कोई इसकी शिकायत करता
है तो डांट डपट कर चुप करा दिया जाता है। मरीजों की शिकायत पर शनिवार को
अमर उजाला की टीम ने अस्पताल का जायजा लिया तो यहां तैनात स्टाफ आराम
फरमाते मिले।
प्रसव के दौरान जच्चा और बच्चा की जान पर न बने, इसके
लिए सरकार जननी सुरक्षा योजना पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च कर रही है,
किंतु सरकार की मंशा पर अस्पताल में तैनात कर्मचारी पानी फेर रहे हैं।
गर्भवती महिला हो या फिर नवजात बच्चे, सभी का टीकाकरण जरूरी है।
इनके
टीकाकरण की जिम्मेदारी अस्पताल में तैनात स्टाफ नर्स की है, किंतु स्टाफ
ने सारी जिम्मेदारी यहां ट्रेनिंग को आने वाली छात्राओं पर थोप दी है।
स्टाफ बस हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है।
शनिवार को महिला अस्पताल के
टीकाकरण कक्ष में यहां तैनात एएनएम के साथ शहर के एक प्राइवेट इंस्टीट्यूट
में एएनएम की ट्रेनिंग कर रहीं आधा दर्जन छात्राएं बैठी थीं। पूर्ण रूप से
ट्रेंड न होने के बाद भी छात्राएं महिलाओं और बच्चों का टीकाकरण कर रही
थीं।
महिला अस्पताल में खून सहित अन्य जांचों के लिए पैथोलॉजी है,
किंतु इस पैथोलॉजी में नियमित रूप से न तो कोई लैब टेक्नीशियन तैनात है और न
ही पैथोलाजिस्ट। एनआरएचएम के तहत संविदा पर उपेंद्र सिंह लैब टेक्नीशियन
के रूप में तैनात हैं।
वह भी चार दिन से छुट्टी पर हैं। चार दिन से
पैथोलॉजी में कोई भी एक्सपर्ट नहीं है, फिर भी धड़ल्ले से महिलाओं के खून,
पेशाब आदि की जांच हो रही थी। शनिवार को दोपहर 12 बजे तक 37 खून के नमूने
जांच को लिए जा चुके थे। पैथोलॉजी में मरीज कम एएनएम की ट्रेनिंग ले रहीं
छात्राएं ज्यादा थीं।
एक छात्रा खून का नमूना भर रही थी, जबकि दो
तीन छात्राएं जांच करने में जुटी थीं। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जांच रिपोर्ट
तैयार करने में जुटा था। सफेद कपड़े पहने छात्राओं को एक्सपर्ट समझकर
महिलाएं भी आराम से खून का नमूना दे रही थीं।