मुख्यमंत्री के गृह जिले में अस्पताल तो धड़ाधड़ बन रहे हैं, पर डाक्टरों की कमी की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। डाक्टरों की कमी पूरी करने के वादे तो खूब हुए, पर कई साल बाद भी हालात जस के तस हैं। जिला अस्पताल के साथ ही अन्य सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की कमी के चलते दूरदराज से आने वाले मरीज बैरंग लौट रहे हैं।
दूसरी तरफ लाखों रुपये खर्च कर खरीदी गई मशीनें और उपकरण भी धूल फांक रहे हैं। मरीजों को इन मशीनों का लाभ नहीं मिल पा रहा है। संपन्न तबके के मरीज तो नर्सिंगहोम चले जाते हैं। मरना उन गरीबों को पड़ता है जो नर्सिंगहोम का खर्चा नहीं उठा पाते।
गर्मी के तेवर तीखे हो जाने से जिला अस्पताल में मरीजों की संख्या में अचानक इजाफ ा हो गया है। ओपीडी में प्रतिदिन 900 से 1000 के बीच मरीज आ रहे हैं। जिला अस्पताल में वैसे तो कई विशेषज्ञाें की कमी है, लेकिन सबसे अधिक समस्या फिजीशियन तथा पीडियाट्रिक्स को लेकर है।
दूरदराज से मरीज बड़ी उम्मीदें लेकर आते हैं और पर्चा बनवाने के बाद चैंबर खाली देखकर बैरंग लौैैट जाते हैं। सीएचसी और पीएचसी में भी डाक्टरों के पद खाली होने से लोगाें क ो इलाज तक मयस्सर नहीं हो पा रहा है। कई बार डाक्टरों के पद भरने के दावे किए जा चुके हैं।
पद तो नहीं भरे गए, यहां पदस्थ डाक्टरों का दीगर जिलों के लिए तबादला जरूर कर दिया गया। जिला अस्पताल में डाक्टरों की कमी तो है ही, कई मशीनें और उपकरण भी धूल फांक रहे हैं। मरीजों के नेत्रों की जांच करने के लिए करीब 5 लाख की लागत से ऑटोरिफलेक्टोमीटर खरीदा गया था। वर्तमान में यह बंद पड़ा है।
मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसी प्रकार महिला इकाई में सोनोग्राफी मशीन का उपयोग नहीं हो पा रहा है। महिलाओं को भी पुरुष इकाई में ही सोनोग्राफी कराने के लिए जाना पड़ता है। लंबे समय तक इंतजार करने से गर्भवती महिलाओं की हालत खराब हो जाती है।
वर्जन
डाक्टरों के पद भरने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। निदेशक स्तर पर भी बातचीत हुई है, डाक्टर देने का आश्वासन मिला है। संविदा के आधार पर पद भरने के लिए आवेदन पेंडिंग हैं। अन्य समस्याओं का भी समाधान किए जाने की क ोशिश चल रही है।
-डा. पीसी पांडेय, सीएमएस, इटावा