इटावा। जिले में स्कूली बच्चों की सुरक्षा के लिए परिवहन विभाग और प्रशासन की सख्ती के बावजूद ओवरलोड वाहनों का संचालन थमने का नाम नहीं ले रहा है। शहर से लेकर कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों तक ऑटो, वैन, ई-रिक्शा और अन्य निजी वाहनों में क्षमता से कई गुना अधिक बच्चों को बैठाकर स्कूल लाया-ले जाया जा रहा है। ऐसे वाहनों में सफर कर रहे मासूमों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। हर दिन हादसे का खतरा बना रहता है।
प्रदेश सरकार के निर्देश पर मिशन फॉर फ्यूचर के तहत एक से सात जुलाई तक स्कूली वाहन चालकों और संचालकों को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाया गया। इसके बाद कार्रवाई शुरू की गई। जिले में करीब 900 पंजीकृत स्कूली बसें और वैन हैं। पिछले 15 दिनों के अभियान में परिवहन विभाग ने नियमों का उल्लंघन करने वाले 22 स्कूली वाहनों के चालान कर आठ वाहनों को सीज किया गया। बावजूद सड़क पर ओवरलोड वाहन धड़ल्ले से दौड़ रहे हैं। सुबह स्कूल खुलने और दोपहर छुट्टी के समय अधिकांश मार्गों पर बच्चों से ठसाठस भरे ऑटो, ई-रिक्शा और वैन आसानी से देखे जा सकते हैं। कई वाहनों में निर्धारित क्षमता से दोगुने बच्चे बैठे मिलते हैं। कुछ बच्चे दरवाजे पर लटककर तो कुछ चालक के बराबर बैठकर सफर करने को मजबूर हैं। इसके बावजूद इन वाहनों पर नियमित और प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
दोपहर करीब 12:40 बजे शहर के प्रधान डाकघर चौराहा के पास एक ऑटो में 12 बच्चे बैठे मिले। स्कूली बैग ऑटो के ऊपर रखे थे। चालक सहित चार सवारियों के परमिट वाले ऑटो में तीन गुना सवारियों को बैठाना खतरों से खाली नहीं है।
दोपहर 12:50 बजे शहर में रोडवेज बस स्टैंड तिराहा के पास एक ई-रिक्शा पर आठ बच्चे सवार नजर आए। ई-रिक्शा पर बड़ा सा बॉक्स भी रखा था, जिससे बच्चे बैठ भी नहीं पा रहे थे। परिवहन विभाग के अनुसार ई-रिक्शा में चालक सहित पांच सवारियों को बैठा सकते है।
दोपहर लगभग 12:30 बजे जसवंतनगर में वैन में 14 से 15 बच्चे बिठाए जा रहे थे, जबकि इस वैन में न तो पीली नंबर प्लेट थी और न ही बच्चों को बिठाने के कोई इंतजाम। स्थिति यह रही कि वैन में बच्चों को ठूंस-ठूंसकर भरा जा रहा था। यह स्थिति नगर के अधिकतर स्कूलों के वाहनों की है।
परिवहन विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुसार स्कूल वाहनों में सुरक्षा संबंधी सभी मानकों का पालन, फिटनेस प्रमाणपत्र, अग्निशमन यंत्र, प्राथमिक उपचार किट, प्रशिक्षित चालक और परिचालक होना अनिवार्य है। इनके बिना बच्चों का व्यावसायिक परिवहन नियमों के विरुद्ध है, लेकिन अधिकांश स्थानों पर इन नियमों का पालन नहीं हो रहा है।
जिला प्रशासन, परिवहन विभाग और पुलिस की ओर से समय-समय पर अभियान चलाकर स्कूल वाहनों की जांच की जाती है। फिटनेस, परमिट, चालक के दस्तावेज और सुरक्षा मानकों को भी परखा जाता है। इसके बावजूद अभियान समाप्त होते ही पुराना सिलसिला फिर शुरू हो जाता है। नियमित निगरानी और स्कूल प्रबंधन की जवाबदेही तय किए बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं लग रहा है।
जिले में लगातार स्कूली वाहनों को लेकर अभियान चलाया जा रहा है। हाल में वाहनों के चालान के साथ ही सीज करने की कार्रवाई भी की गई है। समय-समय पर स्कूल संचालकों के साथ बैठक कर वाहनों के संबंध में चेतावनी दी जाती है। -प्रदीप कुमार, एआरटीओ