जिला अस्पताल परिसर में पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) खुले पांच माह से भी ज्यादा समय गुजर चुका है। इसके बावजूद यहां केवल 16 बच्चों का कुपोषण दूर हो पाया है। जागरूकता की कमी स लोग कुपोषित बच्चे नहीं ला रहे।
बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए केंद्र सरकार लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। कुपोषण के खिलाफ लड़ाई तेज करने के लिए ज्यादातर अफसरों ने तमाम गांवों को गोद भी लिया है लेकिन जिले में महेवा ब्लाक के उझियानी गांव को छोड़ दिया जाए तो अन्य कहीं से लोग अपने बच्चों को भर्ती कराने यहां नहीं लाए हैं।
उल्लेखनीय है कि आंगनबाड़ियों के सहयोग से जिले भर में तय मानक के अनुसार 435 अति कुपोषित बच्चों की पहचान की गई है। इन्हीं के लिए जिला अस्पताल परिसर में जनवरी 15 में पोषण पुनर्वास केंद्र खोला गया।
इसमें बच्चों को कु पोषण से मुक्ति दिलाने के लिए 14 दिन तक रखने, दवाएं व उपचार देने के लिए एक पीडियाट्रिक्स, चार स्टाफ नर्स, एक डायटीशियन, केयरटेकर, कुक की भी व्यवस्था की गई है। बच्चों क ो केंद्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आशा बहुओं, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों तथा एएनएम को सौंपी गई है।
अभिभावक खुद भी अपने कुपोषित बच्चे केंद्र पर ला सकते हैं। चूंकि ज्यादातर कुपोषित बच्चे मजदूर तबके के परिवारों में होते हैं। इसलिए छह माह से पांच साल तक के ऐसे बच्चे के साथ 14 दिन तक रहने वाली मां को भी प्रतिदिन सौ रुपये देने का प्रावधान है। इसके बावजूद बच्चों की संख्या यहां बढ़ नहीं रही।
अप्रैल व मई में मात्र चार बच्चे ही भर्ती हुए। गांव से बच्चों को एनआरसी तक लेकर आने वाली आशा, आंगनबाडी कार्यकत्रियों, एएनएम को भी चार फालोअप के बाद 150 रुपये प्रति बच्चा देने का प्रावधान है लेकिन इसके बाद भी जागरूकता की कमी के चलते कुपोषण दूर कर पाना आसान नहीं नजर आ रहा है।
एनआरसी में एक पीडियाट्रिक्स का पद स्वीकृत है लेकिन वर्तमान में न तो जिला अस्पताल में पीड़ियाट्रिक्स है और न ही फिजीशियन। दो माह पहले तक प्रभारी के रूप में डा. नरेंद्र सिंह काम देखते थे, लेकिन उनका तबादला होने पर पद रिक्त है।
सीएमएस, डा. पीसी पांडेय कहते हैं, कुपोषित बच्चों को एनआरसी में भर्ती के लिए प्रयास किए जा रहे है। हालांकि जागरूकता की कमी से अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। लोगों की अपनी समस्याएं है। बहाना कर वे नहीं आते। किसी प्रकार से बच्चा भर्ती करा भी दिया जाए तो एक दो दिन रुककर लापता हो जाते हैं। रिटायर्ड पीडियाट्रिक्स डा. वीएस अग्निहोत्री एनआरसी में जाकर बच्चों को देख रहें है।
लड़कियों को ज्यादा सता रहा कुपोषण
लड़कों की अपेक्षा आज भी लड़कियों के साथ पौष्टिक आहार देने में भेदभाव किया जाता है। अब तक एनआरसी में 16 कुपोषित बच्चों को लाया गया है। इनमें से 10 लड़कियां है।
चिह्नित कुपोषित बच्चों में भी 60 फीसदी से अधिक लड़किया हैं। यदि कुपोषित बच्चों के माता-पिता को समझाबुझाकर बच्चों को एनआरसी लाया जाए तो अच्छे परिणाम आ सकते हैं।
रिपोर्ट न देने वाले 30 अफसरों का वेतन रोका
इटावा। कुपोषित बच्चों के गांव को गोद लेने के बाद कोई सुध न लेने वाले अधिकारियों पर गाज गिरी है। डीएम ने डीपीओ को निर्देश दिए कि अप्रैल तक रिपोर्ट न देने वालों का वेतन रोका जाए। प्रभारी डीपीओ मनोजकुमार वर्मा ने बताया कि ऐसे अफसरों की संख्या 30 है।
कलेक्ट्रेट सभागार में शुक्रवार को जिलास्तरीय पोषण समिति की बैठक में डीएम नितिन बंसल ने सख्त तेवर दिखाए। उन्होंने सभी सीडीपीओ एवं क्षेत्र के चिकित्साधिकारियों को निर्देश दिए कि जिले के 408 अतिकुपोषित बच्चों की प्रोफाइल बनाई जाए जिसमें बच्चों का फोटो, उनका वजन, लंबाई, हेल्थ चेकअप का ब्योरा, डाक्टरी सलाह आदि दर्ज हो।
उन्होंने प्रभारी डीपीओ को निर्देशित किया कि कुपोषित बच्चों को गोद लेने वाले सभी 60 अधिकारियों की एक बैठक शीघ्र ही कराई जाए। डीएम ने कहा कि जो गर्भवती महिलाएं गंभीर रूप से खून की कमी का शिकार हैं। उनकी सूची बना इलाज हो।
डीएम ने कहा कि जिन अधिकारियों को गांव गोद दिए गए हैं वह आंगनबाड़ी केंद्राें की व्यवस्था का जायजा लें। सीडीओ डा. अशोक चंद्र ने कहा कुपोषण के शिकार बच्चों की देखरेख में कोताही न बरती जाए। बैठक में सीएमओ डा. राजकुमार नैय्यर, बीएसए जेपी राजपूत,डीआईओएस डा. देेवेंद्र प्रकाश, डीएसओ सत्यवीर सिंह, डीपीआरओ एमएल यादव आदि अफसर मौजूद रहे।