इटावा। नुमाइश पंडाल में मंगलवार रात हुए कवि सम्मेलन में ओज के कवि हरिओम पवार ने छप्पन इंची सीने से ही आशा थी दमदारी की... पंक्तियां पढ़ीं तो 5 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान वाली सर्द रात में श्रोताओं का रक्त गर्म कर दिया। विष्णु सक्सेना और अनामिका अंबर ने कार्यक्रम को शृंगार से सराबोर कर दिया।
कवि सम्मेलन का शुभारंभ अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष और सांसद डॉ. रामशंकर कठेरिया और पूर्व विधायक अशोक दुबे ने कवियों के साथ दीप प्रज्वलित कर किया। मां सरस्वती की वंदना के बाद काव्य पाठ की शुरुआत हुई। अपनी धधकती आवाज के लिए विख्यात डॉ. हरिओम पवार ने पढ़ा-तो केवल आवश्यकता थी हिम्मत की खुद्दारी की, छप्पन इंची सीने से ही आशा थी दमदारी की। संविधान को बदल दिया है घाटी गैर नहीं होगी, जहां तिरंगा नहीं मिलेगा उनकी खैर नहीं होगी...।
डॉ. कुंवर बेचैन ने पढ़ा- पहले तो ये चुपके-चुपके यूं ही हिलते डुलते हैं, दिल के दरवाजे हैं आखिर खुलते-खुलते खुलते हैं...। दु:ख ही दु:ख को मांज रहा है जैसे कुछ मैले बर्तन, मिट्टी से ही मैले होते मिट्टी से ही धुलते हैं...। अनामिका अंबर ने शाम भी खास है, वक्त भी खास है, मुझको अहसास है तुझको अहसास है..., इससे ज्यादा हमें और क्या चाहिए, मैं तेरे पास हूं, तू मेरे पास है कविता के जरिये श्रोताओं से रिश्ता जोड़ लिया।
गीत के प्रख्यात हस्ताक्षर विष्णु सक्सेना ने दिले बीमार सही हो वो दवाएं दे... कविता सुनाई। डॉ. कमलेश शर्मा ने पढ़ा नित नवीन शोध क्यों... कृति सुनाई। गजेंद्र प्रियांशु ने पढ़ा -खून के छीटें धरा... कविता सुनाई। इसी तरह रोहित चौधरी ने मुझको चाहत कभी नहीं है... कविता सुनाई।