चकरनगर(इटावा)। चंबल के बीहड़ में तेंदुओं की बढ़ती संख्या और चहलकदमी से किसान भयभीत हैं। ग्रामीणों की माने तो पिछले दस दिन से ऐसे हालात बने हैं। रात के समय तेंदुए को मवेशियों को खाने की चाह में गांवों और खेतों तक आने लगे हैं। एक तरफ किसान सहमे हैं तो दूसरी ओर इस संरक्षित प्रजाति के कुनबे में बढ़ोतरी सेंचुरी क्षेत्र की कामयाबी भी मानी जा रही है।
ग्रामीणों की माने तो एक समय था कि जब चंबल के बीहड़ में चरवाहों को अमूमन तेंदुए देखने को मिल जाया करते थे। लेकिन, जंगल में सरकार की ओर से बोये गए विलायती बबूल के चलते गद्दीदार जानवर चंबल के बीहड़ को छोड़ने पर मजबूर हो गए थे। खासकर तेंदुओं पर इसका असर दिखा। गद्दियों में कांटे लगने की वजह से वे इलाके को छोड़ते गए। इसके अलावा शिकारियों की वजह से इनकी संख्या घटती गई और यह विलुप्त प्रजातियों में शुमार हो गए। सेंचुरी क्षेत्र मेें तमाम तरह के प्रतिबंधों के लगने से अब यह संरक्षित प्रजाति फिर से बढ़ती दिख रही है। हालांकि तेंदुओं की बीहड़ से सटे गांवों में चहलकदमी बढ़ने से किसानों की नींद उड़ी हुई है।
बीहड़ी गांव के किसान छोटे दीक्षित ने बताया कि रात भर जागकर फसल की रखवाली करनी पड़ रही है। क्योंकि आसपास जंगल से तेंदुआ आए दिन निकलकर शिकार की तलाश में खेतों के इर्दगिर्द घूमते दिखाई देते हैं। रात के समय अब खेतों पर अकेले जाना खतरे से खाली नही हैं। कई बार इनकी आवाज भी सुनाई देती है।
किसान कुंवर सिंह चौहान ने बताया कि खेरे के जंगल में बकरी चराते वक्त तेंदुआ अक्सर दिखाई देता है। कभी-कभी तो बकरियों के शिकार की तलाश में यह उनके पीछे पीछे गांव के करीब तक आ जाता है। रात में मौका पाकर कहीं बकरियों का काम तमाम न कर दे। इस चिंता में बाड़े की भी रखवाली करते हैं।
अर्जुन कुशवाह का कहना रहा कि तीन दिन से लगातार रात करीब बारह बजे के आसपास जंगल की ओर से तेंदुए को खेत के किनारे से निकलता हुआ देखा है। चूंकि वह अन्य साथियों के साथ मचान बनाकर खेत की रखवाली करते हैं। इसलिए कुछ हिम्मत बनी रहती है।
भूरे कुशवाहा ने कहा कि वैसे तो तेंदुआ देखकर आदमियों को देखकर कई बार खुद भाग जाता है। फिर भी एक हिंसक पशु होने के नाते डर लगता है। कहीं हमला न कर दे। रात के समय सामूहिक रूप से एक जगह सुरक्षित बैठकर टॉर्च के सहारे फसलों की रखवाली कर रहे हैं।
किसान शैलेंद्र चौहान बताते हैं कि सिर्फ तेंदुआ ही नहीं उनके साथ कई उनके बच्चे भी दिखाई देते हैं। जो इस बात के गवाह हैं कि उनकी संख्या में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। अब खेतों में सोना खतरे से खाली नहीं लगता है।
तेंदुओं की लगातार बढ़ रहीं संख्या
सेंचुरी क्षेत्र में सात सालों से लगातार तेंदुओं की संख्या बढ़ रही है। बीहड़ सूत्रों के अनुसार चंबल में करीब 24 जोड़े तेंदुए और उनके बच्चे चंबल के बीहड़ में हैं। ये आदमखोर नहीं हैं। आदमियों को देखकर भाग जाते हैं। गाय या बकरी को मुख्य रूप से अपना आहार बनाते हैं। अन्य खूंखार जंगली जानवरों की संख्या बीहड़ में कम होने की वजह से भी यह तेंदुआ शिकार की तलाश में रात के वक्त खेतों के आसपास या फिर गांव के किनारे पर पशुबाड़ों की टोह लेते दिखते हैं।
चंबल सेंचुरी क्षेत्र के वनाधिकारी हर किशोर शुक्ला ने बताया कि तेंदुओं की संख्या में इजाफा होने की सूचना उन्हें भी मिलती रहती है। हालांकि उनकी गणना नहीं की जाती है। पुरामुरोंग से लेकर पचनदा क्षेत्र तक करीब 115 गांव सेंचुरी क्षेत्र में पड़ते हैं। इन सभी गांवों में मानव वन्य जीव संघर्ष अभियान के तहत ग्रामीणों को वह सब सावधानियों उठाने की नसीहत दी गई है। ताकि उन्हें कोई क्षति न पहुंचे। फिर भी यदि कोई दिशा निर्देशों का अवहेलना करते हुए जंगलों का जाता है, तभी कोई घटना सामने आती है। उन्होंने कहा कि तेंदुआ इस जंगल का पशु नहीं है। वह मप्र या राजस्थान से यहां आते रहे हैं। अब उनकी चहलकदमी यहां अधिक दिख रही है। इसके सीधे मायने हैं कि सेंचुरी क्षेत्र का माहौल उनके अनुकूल हुआ है।