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पीजीआई में मनाया अस्थमा दिवस

Tue, 05 May 2015 10:57 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
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उत्तर प्रदेश ग्रामीण आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान सैफ ई के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग ने अस्थमा दिवस को अस्थमा जागरूकता दिवस के रूप में मनाया। ओपीडी में आयोजित कार्यक्रम में डाक्टर, मेडिकल स्टूडेंट तथा मरीजों ने भी भाग लिया। कार्यक्रम का उद्घाटन संस्थान के निदेशक डा. (बिग्रेेडियर) टी प्रभाकर ने किया।
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डा. प्रभाकर ने कहा कि अस्थमा का उपचार करने वाले डाक्टरों को चाहिए कि वे इलाज में आ रही नई तकनीक तथा दवाआें का उपयोग क रें। सही समय पर उपचार लेने से सांस संबंधी बीमारियाें को रोका जा सकता है।

दवा तथा मेडिटेशन के समन्वय से अस्थमा पर काबू  पाया जा सकता है। प्राय: यह भी देखा गया है कि अस्थमा यदि बचपन में शुरू हुआ है तो 18 साल की उम्र आते आते अपने आप ही ठीक हो जाता है। पल्मोनरी मेडिकल विभाग के विभागाध्यक्ष डा. आदेश कुमार ने बताया कि दमा के  उपचार में इन्हेलर कारगर है।
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सही दवा एवं नियमित दिनचर्या से अस्थमा के साथ भी अच्छी जिंदगी जी जा सकती है। उन्होंने अस्थमा तथा सीओपीडी के अंतर को बताते हुए कहा कि सीओपीडी की बीमारी वंशानुगत न होकर परिस्थितिजन्य होती है जबकि अस्थमा की बीमारी परिस्थितिजन्य के साथ वंशानुगत भी हो सकता है।

उन्होंने कहा कि अस्थमा से पीड़ित मरीज को एलर्जी वाली चीजाें से दूर रहना चाहिए। अस्थमा के मरीजों को मौसम बदलने पर विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। इस अवसर पर चिकित्सा अधीक्षक डा.(बिग्रेडियर) एस के गुप्ता, न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डा. रमाकांत यादव, कम्यूनिटी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डा. पीके जैन ने भी अपने विचार रखे।

इस अवसर पर डा. आशीष कुमार, डा. आदित्य कुमार गौतम, सीनियर रेजीडेंट डा. प्रशांत यादव, जूनियर रेजीडेंट डा. बालकृ ष्ण कुशवाह, डा. सोमनाथ भट्टाचार्य, डा.श्वेता सरोज के अलावा विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष फैकल्टी मैंबर, मेडिकल स्टूडेंट, मरीज तथा उनके परिजन मौजूद रहे।

‘उपचार न लेने पर बढ़ता है दमा’ 
इटावा। अस्थमा का यदि प्राथमिक स्टेज पर ही पता लगाकर उपचार लेना शुरू कर दिया जाएग तो मरीज सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है। लापरवाही बरतने पर यह गंभीर रूप भी धारण कर सकता है। विश्व अस्थमा दिवस पर यह बात शहर के प्रसिद्ध चेस्टरोेेग विशेषज्ञ डा. आरएस सिंह ने विजय नगर स्थित क्लीनिक पर कही।

उन्होंने बताया कि अस्थमा या दमा फेफड़ों में फेलता है। इसके कारण फेफड़ाें के वायु छिद्रों में सूजन आ जाती है और वायु छिद्र संकुचित हो जाते हैं। संक्रमण से दमा के अटैक का खतरा बढ़ जाता है। डा. सिंह ने बताया कि दमा का उपचार संभव नहीं हैं, लेकिन पूर्ण नियंत्रण संभव है। उपचार का सबसे अच्छा तरीका इनहलेशन थैरेपी को माना जाता है।

इस थैरेपी में सीरप एवं टेबलेट्स की अपेक्षा 50 गुणा खुराक की आवश्यकता होती है। इस दिन उपचार के लिए आने वाले मरीजाें को डा. आरएस सिंह ने अपनी ओर से एक एक इनडोर प्लांट जैसे तुलसी, रातरानी, चमेली, गुलाब, नीबू आदि के पौधे दिए तथा मरीजों को घर के अंदर तथा बाहर अधिक से अधिक पेड़ लगाने की सलाह दी।

डा. सिंह ने बताया कि प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहकर अस्थमा से बचा जा सकता है। इस अवसर पर आशुतोष पंाडेय, यतेंद्र दुबे, अंकित तिवारी (ल्यूपिन कंपनी) भी मौजूद रहे।
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