चकरनगर। चंबल सेंचुरी की चकरनगर रेंज में लुप्तप्राय घड़ियालों की नेस्टिंग का समय शुरू होते ही वन विभाग अलर्ट मोड में आ गया है। अंडे देने के लिए मादा घड़ियाल अब नदी से निकलकर चंबल किनारे की बालू पर सुरक्षित स्थान तलाश रही हैं। इसे देखते हुए विभाग ने संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी है जिससे नेस्टिंग प्रक्रिया बिना किसी बाधा के पूरी हो सके।
चंबल नदी राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से होकर गुजरती है जो घड़ियाल संरक्षण का प्रमुख केंद्र है। वर्ष 1981 से यहां इन दुर्लभ जीवों के संरक्षण का कार्य चल रहा है। वर्तमान में चंबल नदी में कुल 2,938 घड़ियाल मौजूद हैं, जिनमें से 980 इटावा रेंज में पाए जाते हैं। रेंजर कोटेश कुमार त्यागी के अनुसार, अप्रैल माह में मादा घड़ियाल नदी किनारे या टापुओं की मुलायम बालू में घोंसला बनाकर 35 से 60 अंडे देती हैं। यह अंडे लगभग 60 से 80 दिनों तक सुरक्षित रहते हैं और जून माह में उनसे बच्चे निकलते हैं। नेस्टिंग के दौरान वन विभाग घोंसलों की जीपीएस लोकेशन दर्ज कर सुरक्षा के लिए लोहे की जाली लगाता है, जिससे जंगली जानवर अंडों को नुकसान न पहुंचा सकें। हैचिंग के समय जाली हटा दी जाती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, मादा घड़ियाल आमतौर पर रात में नेस्टिंग करती हैं और अंडों की सुरक्षा के लिए पूरी रात घोंसले के आसपास पहरा देती हैं। दिन के समय वह पास ही नदी में रहकर निगरानी करती हैं। यह क्रम अंडों के फूटने तक जारी रहता है। वन विभाग का मानना है कि सतर्कता और संरक्षण प्रयासों के चलते घड़ियालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, जो जैव विविधता संरक्षण के लिए एक सकारात्मक संकेत है।