-खेती की जमीन पर बसाई जा रहीं बस्तियां
-आधा सैकड़ा से अधिक कालोनियों में भूखंडाें का क्रय-विक्रय
-पार्क न ड्रेनेज सिस्टम, ललचाने को डाली गई सड़कें भी उखड़ीं
इटावा। शहर के आसपास खेती की जमीन पर तेजी से रिहायशी बस्तियां बसाई जा रही हैं। खेती का रकबा तेजी से घटता जा रहा है। पांच किमी के क्षेत्रफल में फसलों की जगह पर निर्माणाधीन मकान नजर आ रहे हैं। भूखंडाें की बिक्री के समय जो सब्जबाग दिखाए गए थे वह रेत के महल की तरह ढहते दिख रहे हैं। अवैध कालोनियों में जहां पार्क के लिए जगह छोड़ा जाना बताया गया था, वहां भी मकान दिख रहे हैं। इन बस्तियाें में न तो पानी की व्यवस्था है न ड्रेनेज सिस्टम की। भूखंड बिक्री के समय ग्राहकों को ललचाने के लिए बनवाई गई सड़कें भी गड्ढों मे तब्दील हो चुकी हैं।
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साईं विहार कालोनी
-ग्वालियर बाईपास पर कृषि इंजीनियरिंग कालेज के सामने साईं विहार कालोनी बसाई जा रही है। 20 फीसदी से अधिक भूखंडाें पर भवन बन कर तैयार हो गए हैं। शेष की बुनियादें भरी पड़ी हैं। यहां पर लोगों ने जब प्लाट खरीदे थे तो कोलोनाइजर की ओर से जलनिकासी, पेयजल, सड़क, बिजली, पार्क आदि की सुविधाएं दिए जाने का वादा किया गया था। लाखों खर्च करने के बाद लोग जब वहां रहने पहुंचे तो ठगे से रह गए। बताई गई सुविधाओं में से एक भी मयस्सर नहीं हुईं। जो पहुंच मार्ग बनाया गया था वो भी दो माह के भीतर ध्वस्त हो गया। बोरिंग कराकर लोगाें ने पेयजल की समस्या का हल तो निकाल लिया है। मीलों दूर से बिजली भी ले ली है, लेकिन असल समस्या यह कि घरों से निकलने वाला पानी कहां जाए। न तो नालियां है न कोई अन्य व्यवस्था। हाल फिलहाल लोगोें ने ड्रेनेज वाटर पड़ोस में खाली पड़े प्लाटों में डालना शुरू कर दिया है। लेकिन खाली प्लाट भी जब बन जाएंगे तो क्या होगा। झांसे में आए लोग कोलोनाइजर्स को जी भर कर कोस रहे हैं। बरसात के दिनों में तो ये बस्तियां नरक से भी बदतर हो जाती हैं। बच्चों को कीचड़ में धसकर सड़क तक पहुुंचना पड़ता है।
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कृष्णापुरम् कालोनी
ऐसा ही हाल कृष्णापुरम् कालोनी का है। बताया जाता है कि यह कालोनी पंजीकृत है लेकिन यहां भी हालात अवैध कालोनी से कम नहीं हैं। हाउस टैक्स भरने के लिए तो नोटिस थमाए जा रहे हैं लेकिन यहां नगर पालिका का धेला भर काम नहीं है। कचौरा रोड पर अवैध कालोनियों की संख्या बढ़ती जा रही है। पांच किमी तक कृषि भूमि नहीं बची है। बिना भू-परिवर्तन कराए ही भवनों का निर्माण कराया जा रहा है। प्रशासन के अधिकारी भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे क्योंकि रसूखदारों की पूरी जमात ही इस कारोबार में उतरी हुई है।
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ऐसे चलता है धंधा
कोलोनाइजर्स किसानों से कृषि भूमि का सौदा कर लेते हैं। पार्ट पेमेंट कर उनके साथ एग्रीमेंट कर लिया जाता है। इसके बाद जमीन पर कच्ची सड़कें डाल कर भू-खंड चिह्नित कर दिए जाते हैं। ग्राहकों को प्लाट बेच कर मुनाफा तो कोलोनाईजर्स की जेब में चला जाता है। भू-खंडों की रजिस्ट्री भी किसानों के माध्यम से करा दी जाती है। इससे कालोनाइजर्स को दो फायदे हो रहे हैं। एक तो लाभ उठाने के बाद भी उनका नाम कही भी लाइट में नहीं रहता। दूसरा वे किसानों से सीधे रजिस्ट्री कराकर स्टाम्प ड्यूटी बचा ले जाते हैं।
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भुक्तभोगी बोले-
कल्याण सिंह परमार
हमने पांच लाख रुपये का प्लाट कालोनाइजर्स से खरीदा था। रजिस्ट्री सरैया गांव के एक किसान ने की थी। वर्तमान मे यहां पर कोई भी बुनियादी सुविधा नहीं है। सबमर्सिबल लगवाकर पानी का जुगाड़ तो कर लिया, लेकिन घर का पानी कहां ले जाएं यह चिंता है। जो सड़क कालोनाइजर्स ने बनवाई थी वह अब ध्वस्त हो चुकी है। - कल्याण सिंह परमार
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नरेन्द्र सिंह राजपूत
हमने कृष्णापुरम् में प्लाट लेकर मकान का निर्माण कराया है। आज तक न तो यहां पर पानी की सुविधा है न प्रकाश की और न ही नालियां हैं। घराें के सामने पानी भर रहा है। सड़क तो नाम मात्र के लिए भी नहीं हैं। नगर पालिका ने हाउस टैक्स भरने के लिए नोटिस थमा दिए हैं लेकिन किस बात का पैसा मांगा जा रहा है यह समझ में नहीं आ रहा है।-नरेन्द्र सिंह राजपूत
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