मिरहची। प्रकृति के सफाईकर्मी मृत जानवरों को खाने वाले गिद्ध पिछले कई दशकों से प्राय: विलुप्त हो चुके हैं। मिरहची-मारहरा मार्ग स्थित पापड़ी के वृक्ष पर पिछले दो दिनों से गिद्ध आशियाना बनाए हुए हैं। जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। विलुप्त की कगार पर पहुंच चुके गिद्ध को देखकर लोगों के मन में उत्साह और उमंग भी है।
जिला प्रभागीय वन अधिकारी सुुंदरेशा का कहना है कि गिद्ध को भक्षी पक्षी के रूप में जाना जाता था। गिद्ध जंगलों में मृत जानवरों के अवशेषों और सड़े गले मांस को जल्दी से खा जाता है। जिस कारण मृत अवशेषों की दुर्गंध को जंगल में फैलने से रोकने में सहायक सिद्ध होते थे। इस प्रकार पूरा वातावरण स्वच्छ बना रहता था। इसीलिये गिद्धों को प्राकृतिक सफाईकर्मी की संज्ञा भी दी गई है। भारत की तीन गिद्ध प्रजातियों में 1992 और 2007 के बीच मवेशियों के शवों के माध्यम से डाइक्लोफेनाक के सेवन के कारण 95 से 99.3 फीसदी तक की गिरावट देखी गई। इसके विलुप्त होने का संबंध जैनेटिक रोगों के प्रसार और रेबीज की बढ़ती घटनाओं से भी रहा है।
बताया कि गिद्ध 4 से 6 वर्ष की आयु में प्रजनन योग्य वयस्क पक्षी बन जाते हैं। यह 37-40 वर्ष की दीर्घ आयु प्राप्त करते हैं। 16 नवंबर 2020 को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री ने देश में गिद्धों के संरक्षण के लिये एक ''''गिद्ध संरक्षण कार्य योजना तैयार कर, उसको मूर्त रूप प्रदान किया था। बताया गिद्ध विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। इनके संरक्षण के लिए विभाग से पूर्ण सहयोग रहता है। क्षेत्र के लोगों को यदि गिद्ध देखने को मिले हैं तो अच्छी बात है हम भी टीम भेज कर उनकी देखरेख करेंगे।