दशकों पुराना घंटाघर मरम्मत की बांट जोह रहा है। इसके जर्जर हिस्से आए दिन गिर रहे हैं। अंग्रेजी शासन में बने इस भवन का कुछ हिस्सा दो वर्ष पूर्व टूट चुका है। वर्तमान में भी इसकी हालत खराब है। इससे कभी भी हादसा हो सकता है। दूसरी तरफ वर्षों से बंद पड़ी घंटाघर की घड़ी लोगाें को मुंह चिढ़ा रही है।
लगभग आठ दशक पुराना घंटाघर उपेक्षा का शिकार है। स्थानीय प्रशासन इसकी देखरेख नहीं कर रहा। वहीं अतिक्रमणकारियों की मनमानी इस पर भारी पड़ रही है। यहां लगी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा भी कूड़े के ढेर पर खड़ी है। आरोप है कि घंटाघर के नीचे बैठने वाले लोग सब्जी आदि का कूड़ा इसमें डालकर इति श्री कर रहे हैं। इतना ही नहीं प्रचार प्रसार करने वाले भी इसे नहीं बख्श रहे। यहां बंधे झंडे बैनर इसके प्रमाण हैं। वहीं एक गुंबद ढहने के कगार पर है।
पालिका प्रशासन की उदासीनता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां लगी घड़ी वर्षों से खराब है। जो अपनी बदहाली की कहानी स्वयं बयां कर रही है। बता दें कि उक्त घंटाघर के निर्माण के लिए 15 अक्तूबर 1933 को केवी मिर्जा एमडी हसन अली खां ने नींव रखी थी। 2 अक्तूबर 1962 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा लगी थी। इधर, क्षेत्रीय सभासद सुजीत देव वार्ष्णेय का कहना है कि घंटाघर को सही कराए जाने का उनकी तरफ से प्रयास किया जा रहा है।
आगामी पालिका बोर्ड की बैठक में घंटाघर के जीर्णोंद्धार का प्रस्ताव पास कराया जाएगा। प्रस्ताव पास होते ही इसकी मरम्मत, रंगाई पुताई व बंद पड़ी घड़ी को सही कराया जाएगा।
राकेश गांधी, अध्यक्ष नगरपालिका परिषद एटा।