एटा। सांसद बनने का विचार आया और ठोक दी लोकसभा चुनाव के रण में ताल। किसी पार्टी का टिकट न मिला तो निर्दलीय ही चुनाव लड़ बैठे, लेकिन न तो कोई जनाधार था और न ही ख्याति। नतीजा यह हुआ कि इस रण में बेआबरू होना पड़ा। किसी को 28 तो किसी को 32 मत मिले और ये प्रत्याशी लोकसभा चुनावों की फहरिस्त में निचले पायदान पर हमेशा के लिए दर्ज हो गए।
एटा लोकसभा सीट पर 2019 तक 19 चुनाव हुए। इनमें 134 निर्दलीय प्रत्याशियों ने जोश के साथ दम भरा। शुरूआती चुनावों में मतदाताओं ने निर्दलीय प्रत्याशियों को तवज्जो भी दी। 1957 में हुए चुनाव के दौरान कांग्रेस का वर्चस्व था और इससे पार पाने की किसी दल में ताकत नहीं थी।
ऐसे में निर्दलीय सूरज सिंह ने उन्हें टक्कर दी थी। भले ही 36.73 प्रतिशत मत पाकर कांग्रेस के रोहनलाल चतुर्वेदी विजयी रहे, लेकिन 20.77 प्रतिशत मत के साथ सूरज सिंह ने अपना लोहा मनवाया था। इसके बाद के चुनावों में कभी कोई निर्दलीय मुख्य मुकाबले में नहीं आ सका।
निर्दलीयों ने कुछ चुनावों में मुख्य प्रत्याशियों का गणित बिगाड़ने का काम किया तो बाद में यह भी न कर सके और केवल दिखावा बनकर रह गए। 1996 में हुए चुनाव के दौरान निर्दलीय प्रत्याशियों की बाढ़ सी आ गई। 47 निर्दलीयों ने चुनाव लड़ा था। इसमें किसी को 28 तो किसी को 32 मत हासिल हुए और चुनाव नतीजे आने पर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में कुल 18 प्रत्याशी ऐसे थे जो तीन अंकों का आंकड़ा भी नहीं छू सके थे।
-
सबसे कम मत पाने वाले उम्मीदवार
चुनाव - प्रत्याशी - मत
1996 - आचार्य नेमदत्त उपाध्याय - 28
1996 - अरविंद - 32
1996 - राजवीर सिंह - 35
1996 - संतोष कुमार पचौरी - 43
1996 - राजबहादुर यादव - 47
1996 - अरविंद कुमार - 48
1999 - जयपाल - 70
1999 - संतोष तिवारी - 72
1998 - अशोक रतन - 85