देश की आजादी के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले शहीदों के चेहरे ही याद नहीं रहे। यही नहीं जिले में इन शहीदों की प्रतिमाएं तो दूर इनके चित्र तक नहीं दिख रहे हैं। युवा पीढ़ी अधिकांश शहीदों के फोटो को पहचानती तक नहीं हैं।
देश का दुर्भाग्य कहें या समाज की उदासीनता। क्रांतिकारियों और शहीदों उपेक्षा हो रही है। नेताओं के गुणगान में रहने वाले लोग शहीदों को श्रद्धांजलि देना तक भूल रहे हैं। इतना ही नहीं सैकड़ों संस्थाओं में तो इन शहीदों के फोटो तक नहीं हैं। ऐसे में छात्र-छात्राएं तो दूर गुरूजी तक कुछ शहीदों को फोटो से पहचानते नहीं हैं।
एक प्रधानाचार्य ने स्वीकार किया कि स्कूल के बच्चे तो दूर वो खुद सुखदेव, राजगुरु, रामप्रसाद विस्मिल, अशफाक उल्लाह को फोटो देखकर पहचान नहीं सकते। लोगों का कहना है कि इसके लिए शासन प्रशासन भी जिम्मेदार है। जीवित नेताओं की मूर्तियां लगवाने वाली सरकार शहीदों की प्रतिमाएं नहीं लगवातीं। जिले में इन शहीदों की एक भी प्रतिमा नहीं है।
आजादी का जश्न गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस तक सिमट गया है। शहीदों की सूची चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह तक सीमित है। सुखदेव, राजगुरु, विस्मिल, अशफाक उल्लाह को पहचानना तो दूर नई पीढ़ी को तो इनके नाम तक याद नहीं हैं। इनके फोटो राजकीय पुस्तकालयों और शिक्षण संस्थाओं तक में नहीं हैं।
- दर्शन पाल सिंह चौहान, वरिष्ठ नागरिक