अक्षमों का आदर्श और सक्षम लोगों केलिए प्रेरणा बने हुए हैं बुद्धसेन आर्य। अंधता संस्थान से परास्नातक बुद्घसेन नई पीढ़ी को शिक्षा के साथ कुछ करने का हौसला दे रहे हैं।
जीवन के सोलह बसंत देखने के बाद ही अंधता का शिकार हुए बुद्घसेन ने पठन पाठन का लक्ष्य नहीं छोड़ा। हजारों छात्र-छात्राओं को अंग्रेजी और संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। जिले के सकीट क्षेत्र में जन्मे बुद्घसेन बचपन से ही शिक्षक बनना चाहते थे। लेकिन असमय अंधता ने उन्हें तोड़कर रख दिया लेकिन कुछ करने का जज्बा जीवित रहा। परिवार के विरोध के बावजूद भी उन्होंने आगे की पढ़ाई जारी रखने का लक्ष्य लिया। देहरादून स्थित अंधता विद्यालय से स्नातक और अंग्रेजी-संगीत में परास्नातक की शिक्षा पूरी की। जिले के आधा दर्जन विद्यालयों में अंग्रेजी और संगीत के शिक्षक के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। वर्तमान में वो सुल्तानपुर स्थित वेद वेदांत आर्ष गुरुकुल विद्यापीठ में आचार्य के रूप में सेवारत हैं। पूर्ण अंधता के बाद डबल एमए करने वाले वो जनपद के प्रथम छात्र बने। शिक्षा के व्यवसायीकरण से आहत बुद्घसेन आर्य कहते हैं कि शिक्षा शब्द नहीं विचार है। इसमें शिष्टता, संस्कार, अनुशासन निहित हैं।
सतत प्रयास और दृढ़ इच्छा शक्ति हर समस्या का निदान है। पूर्ण अंधता जैसी गंभीर शारीरिक विकलांगता भी मनोबल को नहीं तोड़ सकी। दिन रात पढ़ने और पढ़ाने की ललक रही।
- बुद्घसेन आर्य, आचार्य आर्ष गुरुकुल, सुल्तानपुर
सेवानिवृति के बाद भी कायम है अध्यापन का जज्बा
एटा। पढ़ाई को मिशन बनाकर जीने का संकल्प कर चुके सिपाही लाल सेवानिवृत्ति के बाद भी शिक्षा के प्रसार में जुटे हैं। गांव गांव पहुंचकर बच्चों को शिक्षा और संस्कार दे रहे हैं। जीवन की अंतिम सांस तक वो अध्यापन करना चाहते हैं।
उच्च प्राथमिक विद्यालय सर्वोदय आश्रम से सिपाहीलाल चार साल पूर्व सेवानिवृत्त तो हो गए लेकिन अपना शिक्षण कार्य नहीं छोड़ा। वो गांव में चौपाल लगाकर बच्चों को शिक्षा देते हैं। तो गांव नगलों में पहुंचकर अशिक्षित बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इस काम को वो अपनी जिम्मेदारी और जुनून मानते हैं।
जीविकोपार्जन के नाम पर शुरू हुआ अध्यापन आज अंतिम लक्ष्य बन चुका है। जो जीवन की अंतिम सांस तक जारी रहेगा। बदले दौर में शिक्षा का प्रचार प्रसार और साक्षरता बढ़ी है। लेकिन संस्कारों का हास हो रहा है।
- सिपाही लाल, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक
शिक्षक भी प्रस्तुत करें आदर्श आचरण
हाईटेक पीढ़ी बातों पर कार्य संस्कृति से प्रभावित
अमर उजाला ब्यूरो
एटा। सरकारी आंकड़े भले ही शिक्षा के बदलते स्वरूप को महिमा मंडित कर रहे हैं लेकिन शिक्षा वास्तविक स्वरूप को खोती जा रही है। विद्वानों के अनुसार इसका आकार बढ़ रहा है लेकिन घनत्व कम होता जा रहा है।
शासन की दोषपूर्ण नीतियां कहें या व्यवसायीकरण के दुष्परिणाम। शिक्षा का प्रचार प्रसार तो बढ़ा है लेकिन स्वरूप बदलता जा रहा है। शिक्षाविद इसके लिए शासन की नीतियों, बदलती सामाजिक आस्थाओं एवं शिक्षकों को भी दोषी मानते हैं। इनका कहना है कि यदि ऐसा ही रहा तो देश में शिक्षिक अशिक्षितों की फौज होगी।
बदलते दौर में शिक्षा का भ्रमित रूप उभर रहा है। शिक्षित दिशाहीन दिख रहे हैं। डिग्रियां-प्रमाणपत्र भी इन्हें आत्मविश्वास नहीं दे पा रहे। बहुसंख्यक युवा पीढ़ी विचलित है। इसके दूरगामी परिणाम आत्मघाती होंगे।
प्रो. भूपेंद्र शंकर, सेवानिवृत प्राचार्य, जेएलएन पीजी कालेज
शैक्षिक पतन के लिए शिक्षक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। उनका काम पुस्तकीय ज्ञान देने तक ही सीमित नहीं है। उन्हें विद्यार्थियों के सामने आदर्श आचरण भी प्रस्तुत करना होगा। हाईटेक दौर का बच्चा बातों नहीं संस्कृति से अधिक प्रभावित होता है।
- प्रो.जीके शर्मा, सेवानिवृत एसोसिएट प्रोफेसर, जेएलएन कालेज