राजकीय इंटर कालेज के छात्र रहे ज्ञानेंद्र रावत आज परिचय के मोहताज नहीं हैं। जल, नदी एवं प्रदूषण - अतिक्रमण पर लिखे लेख लोगों की जुबां पर हैं। जन्म से जनसमस्याओं के प्रति जुझारू रहे रावत ‘नदी-पानी बचाओ अभियान’ के साथ देश की पवित्र नदियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
पटियाली गेट निवासी ज्ञानेंद्र इन दिनों दिल्ली में पर्यावरण के साथ ही जल प्रदूषण एवं अतिक्रमण को लेकर अभियान चला रहे हैं। पर्यावरण को लेकर लिखे जा रहे इनके लेख देश में ही नहीं विदेशों में भी नाम कमा रहे हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में हुए आंदोलनों में सात बार जेल जा चुके रावत का कहना है कि नदियां केवल पानी की वाहक नहीं वरन देश की वैचारिक एवं सांस्कृतिक धरोहर है। दो दशकों से इस अभियान से जुड़े 64 वर्षीय पर्यावरणविद रावत राजकीय इंटर कालेज शताब्दी समारोह में प्रतिभाग करने पहुंचे हैं।
2008 में ‘गंगा सेवा सम्मान’ से सम्मानित ज्ञानेंद्र रावत वर्तमान में
दिल्ली में रहकर इस अभियान को गति दे रहे हैं। दो दशक के ‘नदी पानी बचाओ’
अभियान में इन्हें मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त पर्यावरणविद एमसी मेहता एवं
राजेंद्र सिंह के अलावा पर्यावरणविद गंगापुत्र के नाम से विख्यात डा.
गुरुदास अग्रवाल एवं रवी चोपड़ा के साथ काम कर रहे हैं।
गंगा की बदहाली कानपुर से एटा तक
पर्यावरणविद ज्ञानेंद्र रावत के अनुसार गंगोत्री से लेकर गंगासागर (पश्चिम बंगाल) तक की 1210 किलोमीटर की गंगा किनारों की यात्रा कार से मैग्सेसे अवार्ड के साथियों के साथ 28 से 31 दिनों में पूरी की है। गंगा की सर्वाधिक बदहाली कानपुर से पटना तक ही है। सर्वाधिक बुरा हाल बनारस में है।
साथियों को प्रवेश दिलाने की कीमत कालेज छोड़कर चुकानी पड़ी
1972 में स्थानीय जेएलएन कालेज में बीए के छात्र ज्ञानेंद्र रावत को छात्रों के प्रवेश के लिए किए गए आंदोलन की कीमत कालेज छोड़कर चुकानी पड़ी। इनके नेतृत्व में हुए आंदोलन के बाद प्रवेश से वंचित सैकड़ों विद्यार्थियों को तो प्रवेश मिल गया लेकिन इन्हें संस्था छोड़नी पड़ी और आगे की पढ़ाई के लिए सेवारत सैन्य अधिकारी भाई के पास सागर जाना पड़ा। बताते चलें कि आजादी की 25 वीं वर्षगांठ पर 1972 में बोर्ड परीक्षार्थियों को पांच-पांच अंकों का विशेष ग्रेस दिया गया था। इसके चलते सैकड़ों फेल छात्र भी पास हो गए। इससे स्नातक कक्षाओं में प्रवेश की समस्या गहरा गई।