एटा। रमजान माह में जुमा का विशेष महत्व है। रमजान माह के दूसरे जुमे को मझले जुमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन अधिकांश घरों में रोजा रखकर पांचों वक्त की नमाज पढ़ते हैं। इस दौरान बच्चों और युवाओं ने अल्लाह से कोरोना वायरस जैसी महामारी को भारत ही नहीं दुनिया से जल्द समाप्त करने की दुआ की। महिलाओं ने घरों में बिरयानी, चिकन, मटन के साथ अन्य लजीज व्यंजन बनाए।
रमजान माह के 14वें रोजे के दिन जुमा होने के बावजूद मस्जिदों में नमाज के लिए भीड़ नजर नहीं आई। मुस्लिम समाज के लोगों ने लॉकडाउन का पालन करते हुए घरों में ही नमाज अदा की। महिलाओं ने जहां बच्चों और बुजुर्गोँ के लिए सहरी तैयार की। वहीं परिवार के सदस्यों ने अजान होते ही नमाज कर अपने रोजे की शुरूआत की। कई बच्चों ने पहली बार रोजा रखा तो कई युवाओं ने पहला और मझला रोजा रखा।
- गर्मी के मौसम में परिवार के बुजुर्गों को रोजा रखते देख हमें भी प्रेरणा मिली कि हम भी रोजा रखें। अल्लाह सब ठीक करेंगे। - मोहम्मद मुतालिब।
- लॉकडाउन में रमजान में पूरा परिवार घर में ही है। ऐसे में इससे बढ़िया मौका और कहां होगा रोजा रखने का। - इरशाद सैफी।
- अब तो बस अल्लाह पर ही भरोसा है कि वह हमें इस महामारी से निजात दिलाएंगे। रोजा इसमें सहायता करेगा। - मोहम्मद अनस।
- रमजान माह में जुमा को मझला रोजा रखा। लेकिन नमाज के लिए मस्जिद नहीं जा पाए। ईद पर जाने का मौका मिलेगा। - शबाब खान।