प्राण वायु के बिना किसी भी तरह के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। जब प्राण वायु ही अपना नाता तोड़ ले तो फिर उस टूटी डोर को मौत की संज्ञा दी जाती है। ठीक ऐसा ही हाल है डेढ़ सौ वर्ष पुराने इतिहास को समेटे काली नदी का। नदी में प्राण वायु ऑक्सीजन शून्य हो चुकी है। उद्योग से निकलने वाले कचरे से पानी प्रदूषित हो चुका है। शासन, प्रशासन भी इसके अस्तित्व के खतरे पर मौन हैं।
मुजफ्फर नगर इलाके से करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले इस नदी का उद्गम हुआ। यह नदी मुजफ्फर नगर से लेकर कन्नौज तक जाती है, और जहां गंगा में इसकी धार मिलती है। गंगा को भी अब यह नदी जल नहीं जहर ही दे पा रही है। कासगंज एटा के अलावा इस नदी की धार मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, फर्रुखाबाद, इलाकों में होकर गुजरती है। नदी की लंबाई 300 किलोमीटर से अधिक है। नदी के रास्ते में पड़ने वाले जनपद इलाके के सैकड़ों गांव के लोग नदी के पानी से न केवल सिंचाई करते थे बल्कि ग्रामीण जीवन में इस नदी की बड़ी उपयोगिता थी, लेकिन मुजफ्फरनगर बुलंदशहर आदि औद्योगिक जनपदों में जैसे-जैसे उद्योगों का विस्तार हुआ और नदी में औद्योगिक कचरा एवं रसायन का प्रवाह तेज होता गया। धीरे-धीरे नदी का स्वरूप प्रभावित होने लगा। अब नदी पूरी तरह से मृत है। केंद्रीय जलआयोग की रिपोर्ट में नदी का बीओडी (बायो ऑक्सीजन डिमांड) लेवल शून्य हो चुका है। जबकि पानी में प्रति लीटर बीओडी लेवल तीन एमएल या अधिक रहता है। बीओडी लेवल रहने पर ही पानी योग्य और प्रयोग करने के लिए सुरिक्षत रहता है। शून्य की स्थिति में प्रदूषित और घातक पानी का स्वरूप बन जाता है। काली नदी के तटवर्ती ग्रामीण इलाके में ऐसी स्थिति के चलते भूजल स्तर भी प्रभावित होने के हालात हो गए हैं। लोग त्वचा रोग और पेट की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। तटवर्ती गांव महेशपुर ग्रामीण खूबसिंह का कहना है कि जब से नदी का पानी खराब हुआ है, तब से पशुओं के सामने पानी का संकट हुआ है और किसानों को सिंचाई का संकट हुआ है।
प्रदेश के भूगर्भ जल समिति सलाहकार शिवमंगल सिंह ने बताया कि काली नदी उत्तर प्रदेश की सबसे प्रदूषित नदी है। नदी का पानी पूरी तरह से रसायन युक्त है। मुजफ्फर नगर, मेरठ, गाजियाबाद व अन्य शहरों के सीवेज का पानी इस नदी में आता है।